विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

Bhagavad Gita Shlok: कर्म करने के बाद फल की चिंता सता रही है? श्रीकृष्ण के इस उपदेश से मिलेगा मन को सुकून

Published: Sun, 18 Oct 2026 06:30 AM (IST)

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार कर्म करना मनुष्य के हाथ में है, पर फल नहीं। जानें अध्याय 2 श्लोक 47 कर्मण्येवाधिकारस्ते का ...और पढ़ें

श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश । (Picture Credit- AI Generated)

श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश । (Picture Credit- AI Generated)

HighLights

  1. कर्म पर ध्यान दें, फल की चिंता न करें।

  2. असफलता से सीखें, उसे अपनी योग्यता न मानें।

  3. सफलता-असफलता में मानसिक संतुलन बनाए रखें।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जीवन में कई बार हम किसी काम को पूरी मेहनत और लगन से करते हैं, लेकिन उसके परिणाम की चिंता हमें परेशान करने लगती है। मन में बार-बार सवाल उठते हैं कि सफलता मिलेगी या नहीं, लोग क्या कहेंगे और हमारी मेहनत का सही फल मिलेगा या नहीं। यही चिंता धीरे-धीरे तनाव और बेचैनी का कारण बन जाती है।

श्रीमद्भगवद्गीता का अध्याय 2, श्लोक 47 हमें सिखाता है कि जीवन में कर्म करना हमारे हाथ में है, लेकिन उसका परिणाम हमारे नियंत्रित में संभव नहीं है। इसलिए फल की चिंता में अपना वर्तमान खराब करने के बजाय ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाएं।

गीता का कौन-सा श्लोक मन को शांत रखने की सीख देता है?

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

इस श्लोक में जीवन का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत बताया गया है। मनुष्य को अपने कर्तव्य पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन परिणाम को लेकर इतना परेशान नहीं होना चाहिए कि उसका वर्तमान भी प्रभावित होने लगे।

गीता के श्लोक का सरल अर्थ क्या है?

इस श्लोक का अर्थ है कि मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। इसका मतलब यह नहीं है कि हमें परिणाम की परवाह ही नहीं करनी चाहिए। बल्कि भगवान श्रीकृष्ण समझाते हैं कि परिणाम की चिंता में डूबकर अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। श्लोक का अगला भाग यह भी सिखाता है कि अपने काम के परिणाम का पूरा श्रेय स्वयं को नहीं देना चाहिए। साथ ही, फल की चिंता के कारण कर्म करना छोड़ देना भी उचित नहीं है।

गीता से सीखें मन शांत रखने के 4 तरीके

  • किसी भी काम को पूरी ईमानदारी और मेहनत से करें। बार-बार परिणाम के बारे में सोचने के बजाय अपनी तैयारी और काम की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान दें। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और तनाव कम करने में मदद मिलती है।
  • जीवन में हर बार हमारी इच्छा के अनुसार परिणाम नहीं मिलता। कभी सफलता मिलती है, तो कभी असफलता से सीखने का अवसर मिलता है। असफलता को अपनी योग्यता का अंतिम प्रमाण न मानें। उससे सीखें और आगे बढ़ें।
  • कई बार असफलता का डर हमें कोशिश करने से रोक देता है। लेकिन गीता की शिक्षा है कि डर लगने पर भी छोटे-छोटे कदम उठाते रहना चाहिए और अपने कर्तव्य को निभाना चाहिए।
  • सफलता मिलने पर अहंकार न करें और असफलता मिलने पर खुद को कमजोर न समझें। दोनों परिस्थितियों में शांत रहकर अपने अनुभवों से सीखें। यही सोच जीवन में मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है।

याद रखें, चिंता करने से परिणाम निश्चित नहीं होता, लेकिन सही दिशा में किया गया प्रयास आपकी सफलता की संभावनाओं को बढ़ा देता है।

यह भी पढ़ें- मन की अशांति और दुखों से छुटकारा दिलाएगी अष्टावक्र गीता, जानें 5 बातें जो बदल देंगी सोच

यह भी पढ़ें- श्रीमद्भगवद्गीता के 2 श्लोकों में छिपा जीवन का गहरा रहस्य, श्रीकृष्ण ने बताया मोह-माया से मुक्ति का मार्ग

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।