न रावण दहन, न रामलीला और राम विजय का उत्सव; जानिए 75 दिनों तक चलने वाले अनोखे बस्तर दशहरा का रहस्य
छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा भगवान राम की विजय नहीं, मां दंतेश्वरी की आराधना का पर्व है। न रावण दहन, ...और पढ़ें

बस्तर दशहरा: 75 दिनों का अनोखा उत्सव, मां दंतेश्वरी को समर्पित । (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरे का अलग ही महत्व है। यहां केवल दशहरे वाले दिन ही यह पर्व नहीं मनाया जाता है बल्कि दो महीने पहले से यह त्योहार शुरू हो जाता है और अगले 15 दिन तक चलता रहता है। यहा कुल 75 दिनों तक दशहरा मनाया जाता है।
देश के अधिकांश हिस्सों में जहां दशहरा भगवान राम की रावण पर विजय के रूप में मनाया जाता है, वहीं बस्तर में यह पर्व आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को समर्पित है। यहां न रावण का पुतला जलाया जाता है और न ही उत्सव रामलीला तक सीमित रहता है। यहां 75 दिनों तक हर दिन कोई विशेष उत्सव होता है।
इस वर्ष यह उत्सव 27 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। चलिए हम आपको इस अनूठे दशहरा महोत्सव के महत्व के बारे में विस्तार से बताते हैं।
कौन हैं मां दंतेश्वरी?
मां दंतेश्वरी छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की आराध्य देवी और मां दुर्गा का स्वरूप हैं। स्थानीय लोग इन्हें अपनी कुल देवी मानते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता सती का दांत इस स्थान पर गिरा था, इसलिए देवी का नाम दंतेश्वरी पड़ा। इसी मान्यता से दंतेवाड़ा का नाम भी जुड़ा है।
दंतेवाड़ा में शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम के पास स्थित मां दंतेश्वरी का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर से बनी छह भुजाओं वाली देवी की प्रतिमा है। यहां दशहरे का पर्व मां दंतेश्वरी की आस्था में मनाया जाता है और ये 75 दिन तक चलता है।
रथ का महत्व
बस्तर दशहरे का सबसे आकर्षक दृश्य लकड़ी से बने विशाल रथ का होता है। करीब 40 फुट ऊंचे इस रथ को पारंपरिक औजारों की मदद से कारीगर लगभग दस दिनों में तैयार करते हैं। इस रथ का महत्व तब और बढ़ जाता है, जब भक्तों में इसे खींचने की होड़ मचती है।
रथ के निर्माण के लिए लकड़ी एक गांव से आती है, कारीगर दूसरे गांव से होते हैं और रस्सी की व्यवस्था किसी अन्य इलाके के लोग करते हैं। इसे विजय रथ कहा जाता है। इस रथ को खींचने का पारंपरिक अधिकार किलेपाल परगना के माड़िया आदिवासियों को प्राप्त है। वहीं, इस महोत्सव में नौ दिनों तक गड्ढे में बैठकर साधना करने वाले जोगियों के भी दर्शन होते हैं।
600 साल पुरानी परंपरा की कहानी
मान्यता है कि लगभग 600 साल पहले बस्तर के राजा पुरुषोत्तम देव जगन्नाथ पुरी की यात्रा पर गए थे। उनके साथ विभिन्न समुदायों के मुखिया भी थे। कहा जाता है कि पुरी के राजा ने उन्हें 16 पहियों वाला रथ भेंट किया था। बस्तर दशहरे की रथ परंपरा को इसी ऐतिहासिक कथा से जोड़कर देखा जाता है।
देवी का अनूठा स्वरूप
बस्तर दशहरे की एक अनूठी रस्म में छोटी बच्ची को देवी का स्वरूप माना जाता है। उसकी अनुमति के बाद उत्सव की शुरुआत से जुड़ी रस्मेंआगे बढ़ती हैं। स्थानीय लोग इस परंपरा देवी को प्रति श्रद्धा और कन्या के धार्मिक महत्व को बढ़ावा देने का प्रतीक भी मानते हैं।
रस्मों और रथ परिक्रमा का रोमांच
दशहरे के दौरान हर दिन कोई न कोई पारंपरिक अनुष्ठान होता है। फूलों से सजे रथ की परिक्रमा की जाती है और हजारों लोग छाल से बनी मोटी रस्सियों को थामकर उसे खींचते हैं। विजयदशमी पर विजय रथ निकलता है। काचन गादी की रस्म में काचन और रैला माता की पूजा कर पर्व के सफल आयोजन की कामना की जाती है। भीतर रैनी के दौरान रथ को जंगल में छिपाने की परंपरा भी निभाई जाती है। इसी तरह धीरे-धीरे यह महोत्सव अपने अंतिम चरण में पहुंचता है और मां दंतेश्वरी को विदाई दी जाती है।
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