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अधूरी है पुरी की यात्रा, जब तक न किए जाएं भगवान जगन्नाथ की 'पिशि मां का मंदिर' के दर्शन

Published: Wed, 08 Jul 2026 09:00 AM (IST)

जगन्नाथ रथ यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक भगवान अपनी 'पिशि मां' के मंदिर में जाकर उनका ...और पढ़ें

भगवान जगन्नाथ अपनी पिशि मां से बेहद स्नेह करते थे। (Picture Credit- AI Generated)

भगवान जगन्नाथ अपनी पिशि मां से बेहद स्नेह करते थे। (Picture Credit- AI Generated)

HighLights

  1. जगन्नाथ रथ यात्रा में पिशि मां मंदिर का विशेष महत्व।

  2. भगवान जगन्नाथ अपनी बुआ पिशि मां से मिलने जाते हैं।

  3. पिशि मां द्वारा 'पोडा पीठा' का भोग अर्पित करने की परंपरा।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यह 15 दिन का आयोजन होता है, जिसमें भगवान जगन्‍नाथ नगर में भ्रमण के लिए निकलते हैं और अपने सभी रिश्‍तेदारों से खुद जाकर मिलते हैं।यह बात तो लगभग सभी को पता है कि जगन्‍नाथ 15 दिनों के लिए मंदिर के कक्ष से बाहर निकलकर अपनी मौसी गुंडिचा देवी के मंदिर में रहने के लिए जाते हैं, मगर अपनी इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्‍नाथ अपनी बुआ कुंती से मिलने के लिए भी जाते हैं।
जी हां, पुरी में एक पौराणिक मंदिर देवी कुंती का भी है। इसे 'पिशी मां की कुटिया' भी कहा जाता है। चलिए आज हम आपको इस धार्मिक स्‍थल के महत्‍व के बारे में बताते हैं।

कौन हैं भगवान जगन्नाथ की पिशि मां?

ओड़िया भाषा में 'पिशि' का अर्थ होता है बुआ। महाभारत कथा के अनुसार, कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं । कुंती के पिता राजा शूरसेन थे और श्रीकृष्ण के पिता वासुदेव उनके सगे भाई थे। इस लिहाज से कुंती श्रीकृष्ण की बुआ थीं।
रथ यात्रा के दौरान भगवान श्री जगन्‍नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ पिशी मां की कुटिया जरूर जाते हैं। मान्‍यता अनुसार भगवान जगन्नाथ अपनी बुआ के घर जाकर नौका विहार करते हैं। यह मंदिर चारों तरफ से एक तालाब से घिरा हुआ है। इसी तालाब में भगवान श्री कृष्‍ण नौका विहार करते हैं।
इस मंदिर के अंदर देवी कुंती के साथ 5 पांडवों की भी प्रतिमाएं हैं। साथ में, भगवान श्री जगन्‍नाथ, सुभद्रा और बलभद्र भी मंदिर में विराजमान है।यह बहुत ही अनोखा मंदिर है, जहां भगवान श्री कृष्‍ण के साथ उनकी बुआ की भी पूजा की जाती है।

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(Picture Credit- AI Generated)

पिशि मां मंदिर से जुड़ी दिलचस्प कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपनी पिशि मां से बेहद प्रेम करते थे। एक बार उन्होंने अपनी बुआ से वादा किया कि जब भी वे रथ यात्रा पर निकलेंगे, उनके घर अवश्य आएंगे। तभी से यह परंपरा शुरू हुई कि रथ यात्रा के दौरान भगवान का रथ पिशि मां के मंदिर के सामने कुछ समय के लिए रुकता है। इस मंदिर की विशेष परंपरा है, जब श्री जगन्‍नाथ यहां आते हैं, तब उन्‍हें पोडा पीठा का भोग लगाया जाता है, जो भगवान को अति प्रिय है।

अतः जगन्नाथ भगवान की यात्रा को तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक उन्हें पिशि मां की कुटिया में ले जाकर पोडा पीठा का भोग न लगाया जाए।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।