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    Balram Jayanti 2025: बलराम जयंती पर करें ये विशेष आरती, दूर होंगे सभी कष्ट

    बलराम जयंती (Balram Jayanti 2025) भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है जो इस साल आज यानी 29 अगस्त 2025 को मनाई जा रही है। यह पर्व किसान और माताओं के लिए विशेष महत्व रखता है। बलराम जी को हलधर और दाऊजी के नाम से भी जाना जाता है।

    By Vaishnavi Dwivedi Edited By: Vaishnavi Dwivedi Updated: Fri, 29 Aug 2025 08:57 AM (IST)
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    Balram Jayanti 2025: बलराम जी की आरती।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Balram Jayanti 2025: भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई, बलराम जी का जन्मोत्सव को बलराम जयंती के नाम से जाना जाता है। इस साल यह पर्व आज यानी 29 अगस्त 2025 को मनाया जा रहा है। यह दिन विशेष रूप से किसानों और माताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। भगवान बलराम, जिन्हें हलधर और दाऊजी के नाम से भी जाना जाता है, वे अपनी शक्ति, कृषि ज्ञान और धर्म की रक्षा के लिए पूजे जाते हैं।

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    इस पावन अवसर पर उनकी पूजा और आरती करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है, तो आइए आरती करते हैं -

    ॥बलराम जी की आरती॥

    आरती बाल कृष्ण की कीजै,

    अपना जन्म सफल कर लीजै

    श्री यशोदा का परम दुलारा,

    बाबा के अँखियन का तारा ।

    गोपियन के प्राणन से प्यारा,

    इन पर प्राण न्योछावर कीजै ॥

    ॥आरती बाल कृष्ण की कीजै...॥

    बलदाऊ के छोटे भैया,

    कनुआ कहि कहि बोले मैया ।

    परम मुदित मन लेत बलैया,

    अपना सरबस इनको दीजै ॥

    ॥आरती बाल कृष्ण की कीजै...॥

    श्री राधावर कृष्ण कन्हैया,

    ब्रज जन को नवनीत खवैया ।

    देखत ही मन लेत चुरैया,

    यह छवि नैनन में भरि लीजै ॥

    ॥आरती बाल कृष्ण की कीजै...॥

    तोतली बोलन मधुर सुहावै,

    सखन संग खेलत सुख पावै ।

    सोई सुक्ति जो इनको ध्यावे,

    अब इनको अपना करि लीजै ॥

    ॥आरती बाल कृष्ण की कीजै...॥

    आरती बाल कृष्ण की कीजै,

    अपना जन्म सफल कर लीजै ॥

    ॥श्रीकृष्ण जी की आरती॥

    आरती कुंजबिहारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    आरती कुंजबिहारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    गले में बैजंती माला,

    बजावै मुरली मधुर बाला ।

    श्रवण में कुण्डल झलकाला,

    नंद के आनंद नंदलाला ।

    गगन सम अंग कांति काली,

    राधिका चमक रही आली ।

    लतन में ठाढ़े बनमाली

    भ्रमर सी अलक,

    कस्तूरी तिलक,

    चंद्र सी झलक,

    ललित छवि श्यामा प्यारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    आरती कुंजबिहारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    कनकमय मोर मुकुट बिलसै,

    देवता दरसन को तरसैं ।

    गगन सों सुमन रासि बरसै ।

    बजे मुरचंग,

    मधुर मिरदंग,

    ग्वालिन संग,

    अतुल रति गोप कुमारी की,

    श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

    आरती कुंजबिहारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    जहां ते प्रकट भई गंगा,

    सकल मन हारिणि श्री गंगा ।

    स्मरन ते होत मोह भंगा

    बसी शिव सीस,

    जटा के बीच,

    हरै अघ कीच,

    चरन छवि श्री बनवारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    आरती कुंजबिहारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    चमकती उज्ज्वल तट रेनू,

    बज रही वृंदावन बेनू ।

    चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू

    हंसत मृदु मंद,

    चांदनी चंद,

    कटत भव फंद,

    टेर सुन दीन दुखारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    आरती कुंजबिहारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    आरती कुंजबिहारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

    आरती कुंजबिहारी की,

    श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

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