विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

स्याहु माला के बिना अधूरा माना जाता है अहोई अष्टमी का व्रत! क्या है इसे धारण करने की सही विधि?

Published: Thu, 29 Oct 2026 11:31 AM (IST)

अहोई अष्टमी व्रत में स्याहु माला का विशेष महत्व है, जो संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि के लिए धारण की जाती है।

अहोई अष्टमी व्रत में स्याहु माला है जरूरी, जानें इसे धारण करने की सही विधि (Picture Credit: AI Generated)

अहोई अष्टमी व्रत में स्याहु माला है जरूरी, जानें इसे धारण करने की सही विधि (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. स्याहु माला संतान की दीर्घायु के लिए पहनी जाती है।

  2. अहोई अष्टमी पूजा में स्याहु माला का विशेष महत्व।

  3. चांदी के मोतियों से बनती है यह पवित्र माला।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म के प्रमुख व्रत-त्योहारों में से एक है अहोई अष्टमी का व्रत। यह संतान की दीर्घायु की कामना में रखा जाता है। यह करवाचौथ के चौथे दिन यानी कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत माताएं अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना में और संतान की दीर्घायु और सुख समृद्धि की इच्छा के साथ रखती हैं।

इस दिन मुख्य रूप से माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं और अपनी संतान के कल्याण के लिए पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं।

अहोई अष्टमी की पूजा में सबसे प्रमुख माना जाता है अहोई माता की कथा सुनना और स्याहु माला पहनाना। मान्यता है कि स्याहु माला धारण किए बिना पूजा पूर्ण नहीं होती है। आइए आपको बताते हैं क्या होती है यह माला और इसे धारण करने की सही विधि क्या है?

अहोई अष्टमी पर स्याहु माला क्यों पहनी जाती जाती है?

स्याहु माला को संतान की दीर्घायु की कामना में माताएं धारण करती हैं और ऐसा माना जाता है कि इसे धारण करने से बच्चों को अहोई माता का आशीर्वाद मिलता है।

इस माला को कुछ दिनों तक पहना जाता है मान्यता है कि इस माला को कम से कम दीवाली तक जरूर पहनना चाहिए। यह माला चांदी की मोतियों से बनी होती है और इसमें हर साल एक चांदी का मोती बढ़ा दिया जाता है। इस मोती को बच्चों की उम्र से जोड़ा जाता है।

स्याहु माला का महत्व क्या है?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी पर स्याहु माला धारण करना संतान की सुख-समृद्धि और रक्षा से जुड़ा होता है। इस माला को अहोई माता के प्रति श्रद्धा और संतान के मंगल की कामना के प्रतीक के रूप में धारण किया जाता है। परंपरा के अनुसार, इस माला में चांदी के मोती या मनके होते हैं, जिन्हें संतान की संख्या के अनुसार हर साल जोड़ा जाता है और इससे बच्चों की आयु बढ़ती है।

स्याहु माला कैसे बनाई जाती है?

इस माला को बनाने के लिए अहोई अष्टमी के दिन व्रती माताएं एक मिट्टी के बर्तन में जल भरकर रखती हैं। फिर स्याहु माला का लॉकेट तैयार करके विधिवत अपने बच्चों को उस स्थान पर बैठाकर स्याहु माला तैयार करती हैं।

माला बनाने के बाद मिट्टी के बर्तन में रखा जल बच्चों पर छिड़का जाता है। माला तैयार करने से पहले चांदी के स्याहु लॉकेट को एक लाल रंग के धागे या कलावे में पिरोया जाता है फिर एक-एक करके इसमें मनका जोड़ा जाता है।

अहोई अष्टमी पर स्याहु माला धारण करने का सही तरीका

  • अहोई अष्टमी पर प्रातः जल्दी उठकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूरे दिन के लिए निर्जला व्रत का संकल्प लें और अहोई माता की पूजा की तैयारी करें।
  • पहले से तैयार की गई स्याहु माला को अहोई माता की तस्वीर या पूजा स्थल के सामने रखकर श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर माता से अपने बच्चों की सुख-समृद्धि और अच्छी सेहत की प्रार्थना करें।
  • स्याहु माला में चांदी के मनके संतान की संख्या के अनुरूप रखे जाते हैं। वहीं कुछ स्थानों पर मनकों की संख्या अपने बच्चों की संख्या के अनुसार रखी जाती हैं।
  • पूजा के बाद परिवार में प्रचलित रीति के अनुसार स्याहु माला धारण करें और इसे कम से कम आठ दिन यानी दीवाली तक जरूर धारण करें।

अगर आप भी यहां बताई विधि के अनुसार स्याहु माला धारण करके अहोई अष्टमी का व्रत करेंगी तो माता की कृपा दृष्टि अपनी संतान पर सदैव बनी रहेगी।

यह भी पढ़ें- अहोई अष्टमी पर चांद नहीं, तारों को देखकर ही क्यों खोला जाता है व्रत? 99% माताएं इस रहस्य से होंगी अनजान

यह भी पढ़ें- Ahoi Ashtami 2026: संतान की लंबी उम्र के लिए रख रही हैं व्रत? ये 5 गलतियां कहीं पूजा का फल निष्फल न कर दें

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।