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    मानव में शक्ति का अक्षय भंडार

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    Updated: Wed, 03 Oct 2012 11:30 AM (IST)

    व्यक्ति की सुषुप्त शक्ति को जगाने के लिए आदर्श का तेज चाहिए। मनुष्य अपनी शक्ति का पूरा उपयोग नहीं करता, यह अनुभव-सिद्ध बात है, और यह भी सत्य है कि कोई भी मनुष्य जितना समझता है, उसमें कहीं अधिक शक्ति होती है। मनुष्य के अंदर शक्ति का अक्षय भंडार है। लेकिन अपने से पूरा काम लेना बहुतों को आता ही नहीं।

    नई दिल्ली। व्यक्ति की सुषुप्त शक्ति को जगाने के लिए आदर्श का तेज चाहिए। मनुष्य अपनी शक्ति का पूरा उपयोग नहीं करता, यह अनुभव-सिद्ध बात है, और यह भी सत्य है कि कोई भी मनुष्य जितना समझता है, उसमें कहीं अधिक शक्ति होती है।

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    मनुष्य के अंदर शक्ति का अक्षय भंडार है। लेकिन अपने से पूरा काम लेना बहुतों को आता ही नहीं।

    रेगिस्तान के उदर में पानी का भंडार भरा पड़ा, लेकिन जमीन में नल डालकर पानी को सतह पर न लाया जाए, तो रेगिस्तान रेगिस्तान ही रहेगा।

    मेहनत की होती, तो अधिक नंबर आते।

    तैयारी की होती, तो प्रतियोगिता में इनाम मिलता।

    जवानी में कुछ ध्यान दिया होता, तो बड़ी उम्र में नाम कमाता।

    निस्संदेह, नाम कमाने की तथा नंबर ज्यादा लाने की शक्ति तो थी ही, परंतु शक्ति का उपयोग करने की सूझबूझ नहीं थी, और पानी तो रेगिस्तान के उदर में ही पड़ा रहा।

    उस पानी को बाहर लाया कैसे जाए? थोड़ा विचार करें!

    विद्यार्थी मात्र का अनुभव: महीनों तक पढ़ा नहीं गया। फिर, परीक्षा पास आई तो दिन-रात पुस्तकों में आंखें गड़ी रहने लगीं। परीक्षा निकट आई; पढ़ने का कारण मिला; काम करने का हेतु मन में आया। ध्येय मिल गया, और ध्येय मिलते ही, मन का नाजुक यंत्र काम करने लग गया।

    मनुष्य को कार्य में प्रवृत्त करने वाला बल अपने ध्येय से प्राप्त होता है। यह ध्येय जितना दृढ़, श्रेष्ठ और विशाल होता है, उतना ही अधिक काम मनुष्य से करा सकता है।

    पढ़ने की शक्ति जितनी मार्च में दिखाई दी, उतनी जून में भी थी ही। परंतु जून में ध्येय मंद था, जबकि मार्च में यह तीव्र बना। फिर परीक्षा होना कोई ऊंचा आदर्श नहीं। वह तो सिर्फ इतना ही है कि दो महीनों तक प्रोत्साहित करता रहे। सारे वर्ष, जिंदगी भर प्रेरणा दे और शक्ति का संचार करे, ऐसा आदर्श दिल और दिमाग में बैठ जाय तो समस्त जीवन ही बदल जाए।

    एक विद्यार्थी कॉलेज में पढ़ता था। सामान्य विद्यार्थियों में ही उसकी गिनती थी। एक दिन उसकी मां (उसका पिता तो वर्षो पहले मर चुका था) उसे बुलाकर धीरे-से बात करने लगी, तू अब छोटा नहीं, बड़ा हो गया है। इसलिए घर की बात तुझे समझनी चाहिए। तेरे पिताजी हम पर कुछ कर्ज छोड़कर मरे हैं। यह उनका दोष न था, लेकिन वह कर्ज अदा न कर सके। लेनदार तो समझदार आदमी है, इसलिए कोई दिक्कत नहीं, परंतु बेटा! तेरे पिताजी की इज्जत का सवाल है। यह कर्जा तू चुकाएगा, तभी तू उनका सपूत कहलाएगा।

    विद्यार्थी के मन पर मां की बात का जादू-सा असर हुआ। उसे प्रेरणा मिली, ध्येय मिला और उसी दिन से कक्षा में और आगे चलकर अपने व्यवसाय में भी, वह सदा अगुआ रहा। पिता का कर्ज चुकाते ही, उसका अपना जीवन उन्नति के पथ पर अग्रसर हुआ।

    दूसरी एक सच्ची घटना सुनो! तीन छोटे-छोटे बच्चों की मां। समृद्ध कुटुम्ब में लालन पालन हुआ था, इसलिए घर के काम-काज में कभी हाथ न लगाया। परंतु पति के मर जाने पर उसने कमर कसी। घर के काम-काज, नौकरी और मजदूरी तक करने में वह हिचकी नहीं। इस तरह तीनों बालकों को पढ़ाया और उनके विवाह किए। अंतिम बालक के विवाह के बाद मां शिथिल हो गई और बोली, अब मुझे काम नहीं होता! मतलब यह कि बालकों की जिम्मेदारी जब तक सिर पर थी, जीवन-कार्य बाकी था, ध्येय पूरा करना शेष था, तब तक ही शक्ति रही।

    इच्छा शक्ति मन और शरीर से काम कराती है और जीवन-ध्येय इच्छाशक्ति पैदा करता है। किसी भी कार्य के लिए, साहस के लिए और विशेषत: तो जीवन के लिए ही प्रेरक बल मिल जाए तो बस काम पूरा ही समझो।

    व्यक्ति की सुषुप्त शक्ति जगाने के लिए, आदर्श का तेज चाहिए। जीवन-ध्येय, व्यक्तित्व-निर्माण के रामवाण है। मनोवैज्ञानिक लिण्डवोस्की लिखते हैं, जहां ध्येय है वहां इच्छाशक्ति होती ही है और ध्येय ्रबल एवं स्थायी हो, तो इच्छाशक्ति भी प्रबल एवं स्थायी होती है। किसी भी कार्य की सफलता का मापदंड, उस काम के मूल में स्थित प्रेरक बल है और मनुष्य के व्यक्तित्व का मापदंड उसका जीवन-ध्येय है। फिर अनेक प्रयोग, उदाहरण और आंकड़े उद्धृत करके वह बताता है कि इच्छाशक्ति का आधार अभ्यास नहीं, बल्कि प्रेरक बल होता है।

    इसी प्रकार पढ़ाई में निष्फल होने वाले विद्यार्थियों की बड़े पैमाने पर जांच-पड़ताल करने के बाद आविष्कारक बटरविक ने उसका मूल कारण विद्यार्थियों के मन में पढ़ाई का कोई स्पष्ट लक्ष्य न होना ही बताया है। पढ़ने की शक्ति तो है, लेकिन पढ़ना किसलिए? उपाधि, नौकर, धन प्राप्त करने के लिए? लेकिन ये तो कोई ऊंचे आदर्श नहीं। इसीलिए पढ़ाई का मानदंड ऊंचा हो, नहीं रहा। एक कक्षा के बाद दूसरी में चढ़ना, स्कूल के बाद कॉलेज में जाना, इस प्रकार भेड़ की तरह जिधर हांक दिया, उधर चल दिए। कहां जाना है, यह खबर नहीं है, और न पूछने की आंकाक्षा ही है। फिर उत्साह कहां से स्फुरित हो?

    मोहनदास करमचंद गांधी अफ्रीका जाने से पहले सामान्य आदमी थे, स्कूल में, कॉलेज में और लंदन में उनके भविष्य का कोई आशाप्रद नहीं मान सकता था। फिर शरीर से दुर्बल, स्वभाव से बहुत शर्मीले और सार्वजनिक सभा में बोलने में संकोचशील। पर इस शर्मीले और संकोचशील आदमी के मन में एक अद्भुत आदर्श धीरे-धीरे साकार होने लगा- मातृभूमि की आजादी का! और जैसे-जैसे यह आदर्श दृढ़ होता गया, वैसे-वैसे उनकी शक्ति और अधिक बढ़ती गई।

    शरीर से दुर्बल होते हुए भी मीलों तक उन्होंने कूच किया और अगणित दिनों तक उपवास रखा, संकोच छोड़कर वह वाइसराय और गवर्नर-जनरल से मिले, यही नहीं, बल्कि विशाल मानव-समुदाय के बीच खड़े होकर भाषण दिए। इस तरह प्राणों के समान प्रिय अपने आदर्श को मूर्तिमान किया और अपनी मातृभूमि को स्वंतत्र कराके ही दम लिया।

    जीवन-ध्येय से मनोबल, मनोबल से व्यक्तित्व और व्यक्तित्व से जीवन एवं समाज में शुभ परिवर्तन-यह क्रम गांधीजी के जीवन में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। मन में आदर्श प्रकट होने पर जीवन में सहसा कैसा पलटा आता है, इतिहास में इसका उ”वल दृष्टांत गांधीजी का जीवन है।

    सच्चा आदर्श श्रेष्ठ (बढि़या) और परलक्षी होता है। अपना नाम रौशन करना अथवा बहुत-सा धन एकत्र करना कोई आदर्श नहीं, वह तो स्वार्थ है। स्वजनों का रक्षण और पालन-पोषण इससे कुछ बढि़या ध्येय अवश्य है; परंतु है वह भी संकुचित ही। वस्तुत: तो जिस मात्रा में मनुष्य स्वार्थ छोड़कर दूसरों के लिए जीता है, उसी मात्रा में उसका सच्चा व्यक्तित्व प्रस्फुटित होता है।

    लोकसेवा का आदर्श उत्कृष्ट है, उसका यही कारण है। इसलिए यह पवित्र आदर्श अपने जीवन में यथाशक्ति उतारने के लिए हमें सतत प्रयत्न करना चाहिए। दूसरों का दुख-मन का, देह का अथवा दिल का-दिखाई दे, तो उसे दूर अथवा कम करने के लिए, हममें एक उमंग उठनी चाहिए और यह शुभ काम डॉक्टर, इंजीनियर वकील, मिल मालिक आदि सभी अपने-अपने ढंग से कर सकते हैं। हर एक उसमें से अपने दुखों को सहन करने और अपनी शक्ति का पूरा उपयोग करने के लिए प्रेरणा एवं उत्साह प्राप्त कर सकता है।

    सच्चा आदर्श आदर्श तो होगा ही, नहीं तो वह हमें ऊंचाई पर कैसे ले-जा सकेगा? परंतु साथ ही साथ, वह वास्तविक और व्यावहारिक भी होना चाहिए। कल्पना में और आदर्श में मूलभूत अंतर है। कल्पना दौड़ाते रहने से मन की शक्ति नष्ट होती है; जबकि आदर्श के सेवन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है।

    जीवन-ध्येय तो समस्त जीवन के लिए है, उसकी प्राप्ति जीवन-पर्यत की बात है; परंतु उसका असर आज से ही नित्यप्रति के जीवन पर दिखाई देना चाहिए। आगे चलकर देश के वैज्ञानिक विकास में योगदान देना है, तो आज गणित का अपना पाठ बराबर समझो; भविष्य में देश के कल्याणार्थ राजनीति में भाग लेना है तो आज निकम्मे उपन्यासों को पढ़ने के बदले देश-विदेश के प्रश्रनें का अभ्यास करो; आगे चलकर लोगों की सेवा करनी है, तो आज की स्नेह और सरलता से अपने सहपाठियों की मदद करना सीखो तथा गरीबों के साथ सम्पर्क साधने का अनुभव लो।

    तुम्हारा जीवन-ध्येय तुम्हारी यात्रा की दिशा निश्चित करेगा। इस दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा और शक्ति देगा; दुख में सहनशीलता और सुख में विवेक सुझाएगा; जीवन में चिंतित सफलता दिलाएगा। ुम्हारा जीवन-ध्येय तुम्हें क्रिया में प्रेरित रने वाला बल है, तुम्हारे चरित्र की नींव तुम्हारे व्यक्तित्व का मापदंड है।

    (लेखक स्पेन मूल के गुजराती साहित्यकार हैं। सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक सच्चे इंसान बनो से साभार)

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