हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार के मध्य स्थित माया देवी मंदिर, देवी के 51 शक्तिपीठों में सबसे प्रमुख है। माया देवी धर्मनगरी की अधिष्ठात्री देवी को कहा जाता है। यह वही स्थान है,जहां माता सती के मृत शरीर की नाभि गिरी थी। इस मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही तंत्र साधना भी की जाती है।

प्रचलित मान्यता के अनुसार, एक बार दक्ष प्रजापति ने हरिद्वार स्थित कनखल में यज्ञ किया। यज्ञ में शिव शंकर के अपमान से कुपित होकर माता सती ने हवनकुंड में आहुति दे दी। इस पर शिव शंकर व्यधित होकर पत्‍‌नी के वियोग में खो गए। कहते हैं कि वियोग में भोले शंकर सती के मृत शरीर को लेकर जगह-जगह भटकने लगे।

इसपर विष्णु भगवान ने शिव शंकर के वियोग को समाप्त करने के लिए सुदर्शन चक्र से सती के मृत काया के 51 हिस्से कर दिए। ये हिस्से जहां-जहां गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि माया देवी मंदिर में सती की मृत काया की नाभि गिरी थी और यह जगह माया देवी के रूप में विख्यात हुई। इसीलिए मायादेवी मंदिर को सभी 51 शक्तिपीठों में से प्रमुख शक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि इसी कारण इस पावन धरा का नाम मायापुरी पड़ा। ब्रह्मपुराण में सप्त पुरियोंको मोक्षदायिनी बताया है। इनमें मायापुरी भी शामिल है।

प्राचीन काल से माया देवी मंदिर में देवी की पिंडी विराजमान है। 18वीं सदी में इस मंदिर में देवी की मूर्तियां की भी प्राण-प्रतिष्ठा की गई। मंदिर के बगल में आनंद भैरव का मंदिर भी है। पर्व-त्योहारों के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु माया देवी मंदिर के दर्शन करने को पहुंचते हैं।

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