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    पूजा क्यों कि जाती है, पूजा में क्या ऐसा करें की वो पूरी तरह फलदायी हो

    By Preeti jhaEdited By:
    Updated: Wed, 29 Apr 2015 11:59 AM (IST)

    पूजा का संबंध धर्म, संस्कृति और भगवान से है। कई धर्मों में पूजा की अनेक और लंबी विधियां हैं जबकि कई धर्मों में बड़े ही सादे और सरल ढंग से पूजा की जाती है। दक्षिणी एशिया हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख, इन चार प्रमुख धर्मों की जन्मभूमि है। जबकि ईसाई

    पूजा का संबंध धर्म, संस्कृति और भगवान से है। कई धर्मों में पूजा की अनेक और लंबी विधियां हैं जबकि कई धर्मों में बड़े ही सादे और सरल ढंग से पूजा की जाती है। दक्षिणी एशिया हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख, इन चार प्रमुख धर्मों की जन्मभूमि है। जबकि ईसाई और इस्लाम धर्म का जन्म दक्षिण-पश्चिम में हुआ। इन धर्मों का अनुसरण खासतौर पर येरुशलम, मक्का और मदीना में किया जाता है। इन सभी धर्मों में ईश्वर के अस्तित्व की धारणा है वहीं सिख धर्म के अनुयायी गुरु की धारणा पर विश्वास रखते हैं। लेकिन इन सभी धर्मों में पूजा और प्रार्थना पर विशेष बल दिया जाता है।

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    पूजा-प्रार्थना की प्रथा आज भी मौजूद है। केवल हिन्दू घर्म को छोड़कर बाकी सभी धर्मों का जन्म केवल पिछले 2600 सालों के दौरान ही हुआ है। हिन्दू धर्म का इतिहास लगभग 4000 साल पुराना है और यह दुनिया का सबसे पुराना धर्म है। पूजा के उद्देश्य और महत्व को जानने के लिए हमें मानव जाति के प्रारंभिक काल में जाना होगा, जिस दौरान उस अनजान शक्ति के प्रति मानव चेतना जागी। यहीं पर उन कारणों का भी पता चलता है जिनकी वजह से मनुष्य ने पूजा करना प्रारंभ किया।

    प्रारंभिक काल में प्राकृतिक आपदाओं और खतरों से बचने के लिए मानव ने अनजान शक्तियों की पूजा प्रारंभ की और यहीं से पूजा प्रणाली का जन्म हुआ। उस समय मनुष्य किसी घर में रहने की बजाए जंगल में ही झुंड बनाकर रहते थे। इस समय मनुष्य कुदरत का सीधा और बहुत प्रभाव होता था। मनुष्य को जंगल की आग, भयंकर ज्वालामुखियों, तूफानों, तेज बारिश, बाढ़ तथा भूकंप जैसी कई भयानक आपदाओं का सामना करना पड़ा और इसी वजह से मनुष्य के मन में इन खतरों से बेहद डर पैदा हो गया।

    इन सभी खतरों से डरते हुए मनुष्य ने किसी अनजान शक्ति की कल्पना शुरू की और अपने बचाव के लिए इस शक्ति को खुश करने के प्रयास शुरू कर दिए। वैदिक काल में मनुष्य के इन्हीं प्रयत्नों के फलस्वरूप अग्नि के देवता(अग्नि देव), हवा के देवता(वायु देव), पानी के देवता(वरुण देव), धूप या सूर्य के देवता(सूर्य देव) तथा वज्र के देवता(इंद्र देव) की उपासना शुरू हुई। इसी के साथ मनुष्यों के भीतर अपनी सुरक्षा की भावना बढ़ती गई और धीरे-धीरे प्रकृति के हर कण के प्रति एक आदर भी पैदा होता गया। इस काल में पेड़, जमीन, नदियां, पहाड़, जानवर, सांप, पक्षी तथा अन्य सभी चीजें आस्था का केंद्र बनती जा रही थीं।

    जैसे-जैसे हिन्दू धर्म वैदिक काल से आगे बढ़ा वैसे-वैसे इस धर्म में कई देवी-देवताओं की मान्यता प्रारंभ हो गई। इस समय तक पूजा के लिए भी 100 से ज्यादा विधियां इजात हो चुकीं थी। इसी दौरान कई धार्मिक पुस्तकों की भी रचना हुई। हिन्दू धर्म के प्रारंभिक दौर में ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश की धारणा विकसित हुई।

    पूजा का प्रारंभ किसी खास देवी या देवता को खुश करने के लिए हुआ था। ताकी देवी-देवता की पूजा करके उनको खुश किया जा सके और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सके। मनुष्यों की मनोकामनाओं की पूर्ति, परेशानियों से निजात, शादी, मान-सम्मान में बढ़ोतरी, धन-संपत्ति तथा अन्य कामनाओं की पूर्ति हेतु देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। प्राचीन राजाओं द्वारा अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए अश्वमेध यज्ञ करवाए जाते थे। धार्मिक ग्रंथ रामायण के अनुसार राजा श्री राम ने भी यह यज्ञ करवाया था और उनके द्वारा छोड़े गए घोड़े को उन्हीं के पुत्रों लव-कुश ने पकड़ा था और इसी वजह से पिता-पुत्रों में युद्ध भी हुआ था। यज्ञ, पूजा का ही एक विस्तृत रूप है जिसे आज भी पूजा के लिए प्रयोग किया जाता है।

    पूजा का मुख्य उद्देश्य मनोकामनाओं की पूर्ति तथा भौतिक सुख प्राप्त करना होता है। फल प्राप्ति की इच्छा के बिना पूजा करना , यह विचार महाभारत के युद्ध के दौरान स्पष्ट रूप में तब सामने आया जब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया। उनका यही उपदेश श्रीमद भागवत गीता में मौजूद है।

    हिन्दू मत के अनुसार सभी प्राणियों में जान होती है और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म की प्रक्रिया होती है। यानी जीवन-मृत्यु का चक्र चलता रहता है। माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्माएं एक खास क्रम का हिस्सा बनती हैं और इस क्रम में सबसे ऊपर रहने वाली आत्मा को जन्म-मरण के इस बंधन से मुक्ति मिल जाती है। मुक्ति पाने की कामना ही पूजा की मुख्य वजह है।

    इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही भगवान कृष्ण ने कर्म योग, ज्ञान योग, और भक्ति योग का मार्ग दिखाया।

    सदगुरु पूजा- सदगुरु को भगवान का दूत माना जाता है जो हमारे बीच रहकर ही हमें परमात्मा की राह दिखाता है। भागवत गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि संन्यासी भगवान के ही रूप होते हैं। विभिन्न धर्मों में सदगुरु को विभिन्न नामों से जाना जाता है। इन सदगुरुओं में से कुछ खास नाम हैं- ईसा मसीह, गौतम बुद्ध, भगवान महावीर, आदि शंकराचार्य और पैगंबर मोहम्मद। हाल ही के सदगुरुओं या अवतारों में रामकृष्ण परमहंस, श्री साई नाथ शिरडी वाले, गुरु नानक और कई अन्य नाम शामिल हैं। सदगुरु अपने शिष्यों को परमात्मा मिलन के लिए राह दिखाते हैं जिसमें गुरु की भक्ति की बहुत महत्वता है। इसलिए यह जरूरी है कि शिष्य अपने गुरु का आदर करें।

    पूजा कैसे करें -

    विष्णु को चावल, गणेश जी को तुलसी, देवी को दूर्वा, सूर्य को विल्व पत्र कभी नहीं चढ़ाना चाहिए. शिव जी को विल्व पत्र, विष्णु को तुलसी, गणेश जी को हरी दूर्वा, सूर्य को लाल कनेर के पुष्प प्रिय हैं। पूजा के दौरान दीपक की स्थिति भी सही होनी चाहिए। घी का दीपक सदैव दाईं और तेल का दीपक सदैव बाईं ओर रखना चाहिए। जल, पात्र, घंटा, धूपदानी जैसी वस्तुएं बाईं ओर रखना चाहिए। देवताओं को सदैव अनामिका उंगली से तिलक या सिंदूर लगाना चाहिए। गणेश जी, हनुमान जी, दुर्गा माता, या अन्य मूर्तियों से सिंदूर लेकर माथे पर नहीं लगाना चाहिए। एक दीपक से दूसरा दीपक या दीपक से धूप या कपूर कभी न जलाएं।

    भगवान के आगे जल का चैकोर घेरा बनाकर नैवेद्य रखना चाहिए, जबकि देवी के हमेशा दाईं ओर नैवेद्य रखना चाहिए। पूजन में यदि किसी सामग्री की कमी रह जाए तो परेशान होने या पूजा से उठने के बजाए, उसके स्थान पर अक्षत और फूल चढ़ा दें और मन में उस वस्तु का ध्यान करें। सभी देवताओं को तीन, पांच या सात बार प्रणाम करना चाहिए।

    पूजा में फल चढ़ाए -

    देवी-देवताओं को नैवेद्य के बाद फल चढ़ाए जाते हैं। फल पूर्णता का प्रतीक है। फल चढ़ाकर हम अपने जीवन को सफल बनाने की कामना भगवान से करते हैं। मौसम के अनुसार पांच प्रकार के फल भगवान को चढ़ाए जाते हैं। शक्ति अनुसार कम भी चढ़ा सकते हैं। फल पूर्ण मीठे, रसदार, रंग और सुगंध से पूर्ण होते हैं। फल चढ़ाने का मनोविज्ञान यह है कि हम भी रसदार, मीठे, नया रंग से भरा जीवन जिएं और सफल होवें। जीवन में अच्छे कर्म करें। फल जैसे सद्गुणों की खान है। वैसे ही हम भी बनें। क्योंकि अच्छे कार्य का फल अच्छा ही होता है। फल भगवान को अर्पित करते समय यह भावना भी रहती है कि- हे ईश्वर, मैं यह छिद्र रहित मीठे रस से भरा फल आपको अर्पण कर रहा हूँ। अत: आप भी मेरा जीवन मीठे रस से भर दें और कहीं से भी मेरे घर में दुख का प्रवेश न हो ऐसी मुझ पर कृपा करें।