Somvati Amavasya 2023: आज इस शुभ योग में करें स्नान और तर्पण, मिलेगा सर्वाधिक लाभ
Somvati Amavasya 2023 हिन्दू धर्म में सोमवती अमावस्या का विशेष महत्व है। इस विशेष दिन पर स्नान ध्यान का विशेष महत्व है। शास्त्रों में बताया गया है कि सोमवती अमावस्या के दिन शुभ मुहूर्त में स्नान दान और तर्पण करने से जातक को विशेष लाभ मिलता है।

नई दिल्ली, अध्यात्मिक डेस्क | Somvati Amavasya 2023: हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन मास के दृष्ण पक्ष की अमावस्या को समोवती अमावस्या के नाम सेजानते हैं। आज के दिन स्नान दान का विशेष महत्व है। शास्त्रों में बाताया गया है कि इस विशेष दिन पर स्नान, दान और पितरों को तर्पण आदि देने से व्यक्ति को धन-धान्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है और सभी कार्य सफल हो जाते हैं। बता दें कि फाल्गुन मास की पहली अमावस्या तिथि के दिन अत्यंत शुभ योग का निर्माण हो रहा है, जिसमें स्नान और पितृ तर्पण का विशेष महत्व है। आइए जानते हैं क्या है स्नान और तर्पण का समय, महत्व और मंत्र।
सोमवती अमावस्या शुभ योग (Somvati Amavasya 2023 Snan Shubh Muhurat)
हिन्दू धर्म के अनुसार सोमवती अमावस्या के दिन शिव योग का निर्माण हो रहा है। पंचांग के अनुसार यह योग सुबह 09 बजकर 34 मिनट से 21 फरवरी को सुबह 05 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। सोमवती अमावस्या पर पूरे दिन पंचक रहेगा, किन्तु शुभ मुहूर्त में स्नान, दान और पूजा-पाठ करने से साधकों पर इसका दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सोमवती अमावस्या पर जरूर करें तर्पण (Somvati Amavasya 2023 Tarpan)
शास्त्रों में बताया गया है कि पितरों की आत्मा की शांति के लिए और उनके मोक्ष प्राप्ति की कामना के लिए तर्पण आदि किया जाता है। सोमवती अमावस्या के दिन तर्पण का विशेष महत्व है। इसलिए स्नान के बाद पितरों को तर्पण दें और फिर भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना करें। मान्यता है कि ऐसा करने से कई प्रकार के दोष दूर हो जाते हैं और साधक को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
सोमवती अमावस्या तर्पण मंत्र (Somvati Amavasya 2023 Tarpan Mantra)
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गोत्रे अस्मतपिता (पिता जी और दादा जी का नाम) शर्मा वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।
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गोत्रे अस्मन्माता (माता जी और दादी जी का नाम) देवी वसुरूपास्त् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जल वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।
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पितृ गायत्री मंत्र: ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृो प्रचोदयात्।
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