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    Rohini Vrath and Lord Vasupujya: आज है ये खास दिन मिलती है अपराधों के लिए क्षमा

    By Molly SethEdited By:
    Updated: Thu, 14 Feb 2019 10:16 AM (IST)

    27 नक्षत्रों में से एक नक्षत्र रोहिणी है इस नक्षत्र में किया जाने वाला व्रत रोहिणी व्रत कहलाता है जो जैन समुदाय में प्रचलित त्‍योहारों में से एक है। आइये जाने इस व्रत के बारे में।

    Rohini Vrath and Lord Vasupujya: आज है ये खास दिन मिलती है अपराधों के लिए क्षमा

    जैन धर्म के अनुयायियों का विशेष पर्व

    बृहस्पतिवार को माघ मास का रोहिणी व्रत है। साल के प्रत्‍येक महीने में रोहिणी नक्षत्र आता है। जैन समुदाय में इस व्रत का बेहद महत्‍व है। सत्‍ताइस नक्षत्रों में से एक रोहिणी इस बार 14 फरवरी को पड़ रहा है। जब उदियातिथी अर्थात सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है, उस दिन रोहिणी व्रत किया जाता है। ये व्रत विशेष रूप से जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा किया जाता हैं इस दिन वे भगवान वासुपूज्य की पूजा करते हैं। इसे 3, 5 या 7 वर्षों तक करने के बाद ही उद्यापन किया जा सकता है।

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    रोहिणी व्रत का महत्‍व

    यह व्रत महिलाओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। जैन परिवारों की महिलाओं के लिए तो इस व्रत का पालन करना अति आवश्यक माना गया है। यह व्रत ‘रोहिणी देवी’ से जुड़ा है। इस दिन पूरे विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है। वैसे पुरुष भी ये व्रत कर सकते हैं। इस पूजा में जैन धर्म के लोग भगवान वासुपूज्य की पूजा करते हैं। महिलायें अपने पति की लम्बी आयु एवम स्वास्थ्य के लिए करती हैं। इस व्रत को करने से धन, धान्‍य, और सुखों में वृद्धि होती है। इस दिन व्रत करने वाले भगवान से अपने अपराधों की क्षमा मांग कर मुक्‍त होते हैं।

    रोहिणी व्रत विधि

    इस दिन महिलायें प्रात: काल जल्दी उठकर स्नान करके पवित्र होकर पूजा करती हैं। इस व्रत में भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है। पूजा के लिए वासुपूज्‍य भगवान की पांचरत्‍न, ताम्र या स्‍वर्ण प्रतिमा की स्‍थापना की जाती है। उनकी आराधना करके दो वस्‍त्रों, फूल, फल  और नैवेध्य का भोग लगाया जाता है। रोहिणी व्रत का पालन उदिया तिथि में रोहिणी नक्षत्र के दिन से शुरू होकर अगले नक्षत्र मार्गशीर्ष तक चलता है। इस दिन गरीबों को दान देने का भी महत्व होता है।

    रोहिणी व्रत कथा

    प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे, उनके सात पुत्र एवं एक रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने एक ज्योतिषी से पूछा, कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने बताया कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ उसका विवाह होगा। तब राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया, जिसमें रोहिणी ने राजकुमार अशोक का वरण किया आैर दोनों का विवाह संपन्‍न हुआ। एक बार हस्तिनापुर में श्री चारण मुनि आये, राजा अपने परिवार के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण करने के बाद पूछा, कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब मुनि ने कहा, कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। धनमित्र की एक दुर्गंधा कन्‍या थी जिसके बारे में उसके पिता को हमेशा चिंता रहती थी, कि इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा। धनमित्र ने दहेज का लालच दे कर उसका विवाह अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से कर दिया। इसके बावजूद ये विवाह सफल नहीं हुआ आैर कन्या की दुर्गंध से पीडि़त होकर उसका पति एक महीने बाद ही उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन नाम के ऋषि विहार करते हुए नगर में आये, तो धनमित्र अपनी पुत्री के साथ उन्हें प्रणाम करने गया आैर बेटी के दुख का कारण आैर उसको दूर करने का उपाय पूछा। तब ऋषि ने बताया कि उसकी बेटी पूर्व जन्म में गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल की सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा ने वन जाते हुए रास्ते में एक मुनि को देखा तो रानी से उनके भोजन की व्यवस्था करने को कह आगे चला गया। अपने आनंद में विघ्न पड़ने से रानी गुस्से में आ गर्इ आैर ऋषि के भोजन में कडुवी तुम्‍बीका परोसा जिससे मुनि को अत्‍यंत वेदना हुई और उन्‍होंने प्राण भी त्‍याग दिये। राजा को जब ये पता चला तो उसने तो रानी कात्याग किया ही ऋषि हत्या के पाप के कारण उसके शरीर में कोढ़ हो गया आैर अत्यंत कष्ट आैर पीड़ा को भोगते हुए मरने के बाद वो रौरव नर्क को प्राप्त हुर्इ आैर फिर दुर्गंध युक्त कन्या के रूप में धनमित्र के घर पैदा हुर्इ। तब धनमित्र ने पूछा कि किस व्रत आैर  धर्म कार्य करने से इस पाप से मुक्ति मिल सकती है। तब ऋषि ने बताया कि सम्‍यग्दर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो, अर्थात् हर महीने में रोहिणी नक्षत्र पर चारों प्रकार के आहार त्‍याग कर श्री जिन चैत्‍यालय में जाकर धर्मध्‍यान सहित सोलह प्रहर व्‍यतीत करें। यानि सामायिक, स्‍वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बितायें आैर क्षमता अनुसार दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 महीने तक करें, तो मुक्ति हो सकती है। इस पर दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और अंत में मृत्यु के बाद प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। इसके बाद जन्म लेने पर राजा अशोक की रानी बनी। तब अशोक ने अपने बारे में पूछा, तो मुनि ने कहा कि पूर्व जन्म में भील होते हुए उसने एक मुनि पर घोर उपसर्ग किया था। इसलिए मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर अत्‍यंत घृणित शरीर वाले पुत्र के रूप में जन्म लिया। इसके बाद एक साधु के उपदेश पर उसने रोहिण व्रत किया जिसके फलस्‍वरूप स्वर्ग प्राप्त करके राजा बन कर हस्तिनापुर में जन्म लिया। तब से मान्यता बनी जैसे राजा अशोक और रानी रोहिणी ने रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख भोगकर मोक्ष प्राप्‍त किया उसी प्रकार जो भी श्रद्धासहित यह व्रत करेगा वे सभी उत्‍तम सुख को प्राप्त करेंगे।

    रोहिणी व्रत उद्यापन विधि

    यह व्रत एक निश्चित काल तक ही किया जा सकता हैं। व्रत को कब तक करना है ये व्रत करने वाले को निश्‍चित करना होता है। मानी गई व्रत अवधि पूरी होने पर इस व्रत का उद्यापन कर दिया जाता है। वैसे इसके लिए 5 वर्ष 5 माह की अवधि श्रेष्ठ मानी गयी है। उद्यापन के लिए इस व्रत को नियमित रूप से करके गरीबो को भोजन कराया जाता है। दान भी दिया जाता हैं। भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती हैं और उद्यापन के दिन इनके दर्शन किये जाते हैं।