होती है बही खातों की पूजा  

श्री महागणपति, महालक्ष्मी एवं महामाया महाकाली की पौराणिक अथवा तांत्रिक (आगम शास्त्रीय) विधि से साधना-उपासना का परम पुनीत पर्व दीपावली है। दीपावली में उद्योग-व्यापार के नवीन कार्य प्रारम्भ करने एवं पुराने व्यापार में खाता (बसना) पूजन का विधान सर्वत्र लोकप्रिय है। इस वर्ष श्री शुभ सम्वत् 2075 शाके 1940 कार्तिक कृष्ण अमावस्या 30 ( प्रदोष-कालीन ) अंग्रेजी तारीखानुसार 07 नवम्बर 2018 बुधवार को है। अमावस्या तिथि सूर्योदय से लेकर रात्रि घं.09 मि.32 तक रहेगी। दीपावली के पूजन हेतु धर्मशास्त्रीयमान्यतानुसार प्रदोष काल मुख्य हैं। इसके अतिरिक्त इस दिन स्वाती नक्षत्र सूर्योदय काल से लेकर शाम घं.07 मि.37 बजे तक व्याप्त रहेगा, तत्पश्चात् विशाखा नक्षत्र लगेगा। सूर्योदय काल से लेकर शाम घं.05 मि.57 तक आयुष्मान योग रहेगा, तत्पश्चात् सौभाग्य योग लग जाएगा।

सर्वोत्म लक्ष्मी पूजन काल

धर्मशास्त्रानुसार दीपावली प्रदोष काल एवं महानिशीथ काल व्यापिनी अमावस्या में विहित है, जिसमें प्रदोष काल का महत्व गृहस्थों एवं व्यापारियों के लिये, तथा महानिशीथ काल का उपयोग आगमशास्त्र (तांत्रिक) विधि से पूजन हेतु उपयुक्त है। प्रदोष काल से तात्पर्य है दिन-रात्रि का संयोग काल। दिन विष्णुरुप और रात्रि लक्ष्मीस्वरुपा है, इन दोनों का संयोग काल ही प्रदोष काल है। धर्म सिन्धु  में कहा है-तुलासंस्थे सहस्त्राशौं प्रदोषे भूतदर्शयोः। उल्काहस्ता नरा कुर्युः पितृणां मार्गदर्शनम्। दण्डैकरजनीयोगे दर्शः स्यात्तु परेऽहनि। तदा विहाय पूर्वेद्युः परेसुखरात्रि के। अर्धरात्रे भ्रमत्येव लक्ष्मीराश्रयितुं गृहान्। अतः स्वलंकृता लिप्ता दीपैर्जाग्रज्जनोत्सवा। सुधा धवलिता कार्याः पुष्पमालोपशोभिताः। अपर्राें प्रकर्तव्यं श्राद्धं पितृपरायणैः। प्रदोषसमये राजन् कर्तव्या दीपमालिका।। उपरोक्त वचनानुसार प्रदोष समय लक्ष्मी पूजन काल है। प्रदोषार्धरात्रिव्यापिनी अमावस्या में दीपावली विहित है।

प्रदोष काल की गणना 

दीपावली के दिन धर्मशास्त्रोक्त प्रदोष काल शाम घं.05 मि.14 से लेकर घं.07 मि.50 तक रहेगा। इसमें स्थिर लग्न वृष का समावेश घं.05 मि.41 से लेकर घं.07 मि.37 तक रहेगा। इस लग्न के अनुसार लग्नेश/षष्ठेश शुक्र, चतुर्थेश सूर्य, तृतीयेश चन्द्र षष्ठ भाव में तुला राशि पर विद्यमान हैं। नवमेश-दशमेश शनि अष्टम भाव में योगकारक होकर धनु राशि पर स्थित है। राहु कर्क का तृतीय में शुभ है। द्वितीयेश व पंचमेश बुध, अष्टमेश व एकादशेश गुरू के सप्तम भाव में हैं, ज्योतिष शास्त्र की मान्यातानुसार शुक्र लग्नेश होने के कारण शुभ होता है। नवमेश-दशमेश शनि केन्द्र-त्रिकोण का स्वामी होकर अष्टम भाव में है, जो कि प्रबल राजयोग का लक्षण है। छठे भाव में चन्द्र अशुभ है, अतः वृष लग्न में खाता (बसना) पूजन करने के पूर्व चन्द्र और केतु का दानोपाय कर लेना उपयुक्त रहेगा।

चौघड़िया मुहूर्त 

इसके पश्चात् दूसरी स्थिर लग्न सिंह रात्रि घं.12 मि.09 से  लेकर घं.02 मि.23 तक रहेगी। इस लग्न के समय अमावस्या का अभाव है, किन्तु जो लोग करना चाहें उनके लिए तृतीय भाव में सूर्य, चन्द्र, शुक्र एक साथ हैं। यह अति शुभ योग बनता है। योगकारक मंगल चतुर्थेश और नवमेश हो कर सप्तम भाव में चन्द्रमा से नवपंचक शुभकारक योग बनाता है। इसमें खाता (बसना) पूजन हेतु केतु-शनि, का उपाय उत्तम है।

महानिशीथ काल में पूजन करने वालों के लिये इस दिन महानिशीथ काल रात्रि घं.11 मि.14 से घं.12 मि.06 बजे तक व्याप्त रहेगा। यह अति शुभ और अति कल्याणकारी मुहूर्त है।

चौघड़िया मुहूर्त के विचार से शाम घं.06 मि.51 से लेकर रात्रि घं.11 मि.42 तक शुभ, अमृत, चर की चौघड़िया की संयुक्त वेला रहेगी, तथा रात्रि घं.02 मि.56 से लेकर घं.04 मि.33 तक लाभ की चौघड़िया रहेगी। अतः इस संयुक्त वेला में अपनी कुल परम्परा के अनुसार श्री महागणपति, श्री महालक्ष्मी, श्री कुबेर जी, श्री महाकाली एवं खाता (बसना) पूजनादि ज्योतिषी जी को कुण्डली आदि दिखवाकर अशुभ ग्रहों का दानोपाय करके पूजनादि शुभ-मंगलमय होगा।

Posted By: Molly Seth