आज छठ पूजा का मुख्य दिन है। छठ पूजा के दिन सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है। छठ पूजा का व्रत महिलाएं अपनी संतान की रक्षा और सुखी जीवन के लिए रखती हैं। साथ ही पूरे परिवार की सुख शांति की कामना के लिए भी यह व्रत किया जाता है। मान्यता है कि खरना की पूजा करने के बाद घर में देवी षष्ठी का आगमन होता है। फिर तीसरे और चौथे दिन इस पर्व का सबसे अहम होता है। इसे ही सांध्य और उषा अर्घ्‍य कहा जाता है। जानें सांध्य और उषा अर्घ्‍य के बारे में।

संध्या अर्घ्य: छठ पूजा का पर्व षष्ठी के दिन ही होता है। इस दिन संध्या अर्घ्य का महत्व है। इस दिन संध्या के समय सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है। साथ ही इनकी विधिवत पूजा भी की जाती है। इस दौरान सूर्यदेव अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ होते हैं। ऐसे में प्रत्यूषा को अर्घ्य देने का लाभ भी इस दौरान मिलता है। इस दिन शाम के समय बांस की टोकरी में ठेकुआ, चावल के लड्डू और कुछ फल रखे जाते हैं। इसे सजाने के बाद सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। ऐसे ही छठी मैय्या की पूजा की जाती है। फिर व्रत कथा सुनी जाती है और छठी मैय्या के गीत गाए जाते हैं।

उषा अर्घ्य: इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठ जाना चाहिए और फिर नदी के घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। षष्ठी के दूसरे दिन सप्तमी को उषाकाल में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इससे ही व्रत का पारण और समापन होता है। छठ पूजा के अंतिम दिन का अर्घ्य सूर्य की वरुण वेला में दिया जाता है। इस दिन का अर्घ्य सूर्य की पत्नी उषा को दिया जाता है। पूजा करने के बाद जिस व्यक्ति ने व्रत रखा होता है वह दूध का शरबत पीकर और प्रसाद खाकर व्रत को पूरा करता है। इसी दिन छठ का समापन होता है।

सांध्य अर्घ्य का मुहूर्त: सूर्योदय 06:48 बजे पर

सूर्योस्त 05:26 बजे पर

षष्ठी तिथि का प्रारम्भ 19 नवंबर को रात 09:59 बजे से 20 नवंबर रात 09:29 बजे तक

संध्या सूर्य अर्घ्य: 20 नवंबर, दिन शुक्रवार, सूर्योदय: 06:48 बजे और सूर्यास्त: 05:26 बजे

उषा अर्घ्य: 21 नवंबर, दिन शनिवार सूर्योदय अर्घ्य तथा पारण, सूर्योदय सुबह 06:49 बजे तथा सूर्योस्त शाम को 05:25 बजे

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