निषिद्घ ब्राह्मणों की है एक सूची

पितृ पक्ष में श्राद्घ करते हुए किन ब्राह्मणों का चयन किया जाए आैर किनका नहीं इसके बारे में शास्त्रों में विस्तृत जानकारी दी गर्इ है। यहां निषिद्ध ब्राह्मणों की सूची बड़ी लम्बी है। शास्त्रों का कठोर आदेश है कि अन्य किसी धार्मिक कार्य में ब्राह्मणों की परीक्षा न की जाय, पर श्राद्ध में जिन ब्राह्मणों को आमन्त्रित करना हो, उनकी परीक्षा अवश्य की जाय और परीक्षा आमन्त्रित करने के पूर्व की जाय, बाद में नहीं- न ब्राह्मणं परीक्षेत देवै कर्मणि धर्मवित्। पित्रये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः। उशनाः - भोजनं तु निःशेषं कुर्यात् प्राज्ञः कथन्चन। अन्यत्र दध्नः क्षीराद्वा क्षौद्रात्सक्तुभ्य एव च।। इसका अर्थ है कि उशना ने कहा है - बुद्धिमान व्यक्ति कभी निःशेष भोजन न करे। अर्थात्-थाली में कुछ अवश्य छोड़ दे, लेकिन दधि, दूध सहत और सत्तु को नहीं छोड़ना चाहिए।

ब्राह्मे - न चाश्रु पातयेज्जातु  न शुष्कां गिरमीयेत्। न चोद्विक्षेत् भुन्जानान न च कुर्वीत मत्सरम्।। इसी प्रकार ब्रह्मपुराण में कहा है- आँसू को न गिरावे। न रूखी वाणी कहे। भोजन करते हुए ब्राह्मणों को न देखें और न मत्सर यानि डाह, ईर्ष्या करे। वहीं पर चन्द्रिका में स्मृत्यन्तर का वचन है कि - गोत्र के अपरिज्ञान में कश्यप गोत्र कहा है। इसीलिए श्रुति ( वेद ) ने कहा है कि - जितनी प्रजा हैं वे सब कश्यप से पैदा हुई है। यह व्यवस्था उनके लिए है जिन्हें अपना गोत्र नहीं मालूम है। यमः -- स्वाध्यायं श्रावयेत्सम्यक् धर्मशास्त्राणि चैव हि। यम ने कहा है -- वेद और धर्मशास्त्रों को अच्छी प्रकार से सुनावे। गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने कश्यपं गोत्रमुच्यते। तस्मादाह श्रुतिः सर्वाः प्रज्ञाः कश्यपसंभवाः।।

अपने निवास पर ही करें श्राद्घ     

एेसा भी पिर्देश है कि श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि पर कभी न किया जाय। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्रीय निर्देश है कि दूसरे के घर में जो श्राद्ध किया जाता है, उसमें श्राद्ध करने वाले पितरों को कुछ नहीं मिलता। गृह-स्वामी के पितर बलात् सब छीन लेते हैं - परकीय गृहे यस्तु स्वात्पितृस्तर्पयेद्यदि। तद्भूमि स्वामिनस्तस्य हरन्ति पितरोबलात्।। यह भी कहा गया है कि दूसरे के प्रदेश में यदि श्राद्ध किया जाय तो उस प्रदेश के स्वामी के पितर श्राद्धकर्म का विनाश कर देते हैं- परकीय प्रदेशेषु पितृणां निवषयेत्तुयः। तद्भूमि स्वामि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते।। इसीलिए तीर्थ में किये गये श्राद्ध से भी आठ गुना पुण्यप्रद श्राद्ध अपने घर में करने से होता है-‘तीर्थादष्टगृणं पुण्यं स्वगृहे ददतः शुभे।’ यदि किसी विवशता के कारण दूसरे के गृह अथवा भूमि पर श्राद्ध करना ही पड़े तो भूमि का मूल्य अथवा किराया पहले उसके स्वामी को दे दिया जाय।

 

Posted By: Molly Seth