Sri Durga Malleswara Swamy Varla Devasthanam: दुर्गा मां का एक प्राचीन मंदिर विजयवाड़ा के इंद्रकीलाद्री पर्वत पर स्थित है। मान्यता है कि कनक दुर्गा मंदिर में मां की प्रतिमा स्वयंभू है। इस मंदिर में हर दिन हजारों तीर्थयात्री आते हैं। इस मंदिर का सात शिवलीला और शक्ति महिमाओं में विशेष स्थान है। नवरात्रि में यहां पर मौजूद कनक दुर्गा को बालत्रिपुरा सुंदरी, गायत्री, अन्नपूर्णा, महालक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा देवी, महिसासुरमर्दिनी और राजराजेश्वरी देवी के रूप में सजाया जाता है। फिर विजयदशमी के दिन नावों पर, जो हंस के आकार की होती है देवियों को कृष्णा नदी का भ्रमण करवाया जाता है। यह प्रथा थेप्पोत्सवम नाम से जानी जाती है। यह त्यौहार नौ दिन तक चलता है। यहां पर आयुध पूजा का भी आयोजन किया जाता है। इस मंदिर के पीछे एक कथा भी प्रचलित है जो कुछ इस प्रकार है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार राक्षसों ने पृथ्वी पर तबाही मचा दी थी। इनका वध करने के लिए माता पार्वती ने कई रूप धारण किए। कौशिक अवतार में शुंभ-निशुंभ, महिसासुरमर्दिनी अवतार में महिषासुर, दुर्गा के अवतार में दुर्गमसुर का वध किया। इसी तरह और भी कई रूप धारण किए। कनक दुर्गा का एक श्रद्धालु था जिसका नाम कीलाणु था। मां ने उसे आदेश दिया कि वो एक पर्वत बनाए। उन्होंने कहा कि वे इस पर्वत पर निवास करेंगी। तब कनक दुर्गा के भक्त ने इस स्थान को बनाया था।

इस मंदिर पर पहुंचने के लिए सीढ़ियां और सड़कें हैं। हालांकि, ज्यादातर श्रद्धालु इस मंदिर में जाने के लिए सीढ़ियों का इस्तेमाल करना ज्यादा पसंद करते हैं। वहीं, कुछ श्रद्धालु ऐसे भी हैं जो हल्दी से सीढि़यों को सजाते हैं और फिर चढ़ते हैं। इस प्रक्रिया को मेतला पूजा कहते हैं। मेतला पूजा का अर्थ सीढ़ियों का पूजन है। यह मंदिर एक ऐसा स्थान जहां एक बार जो व्यक्ति आता है वह इसके संस्मरण को पूरी जिंदगी नहीं भूल सकता है। नवरात्रि के दौरान इस मंदिर में भक्तों का तांता लगता है।

मान्यता है कि इस स्थान पर अर्जुन ने भगवान शिव ने कठोर तपस्या की थी और इसके फलस्वरूप पाशुपथ अस्त्र की प्राप्ति हुई थी। यहां पर अर्जुन ने दुर्गा मां का मंदिर बनवाया था। कहा तो यह भी जाता है कि आदिदेव शंकराचार्य ने भी यहां भ्रमण किया था। यहां पर उन्होंने अपना श्रीचक्र स्थापित किया था और माता की वैदिक पद्धति से पूजा-अर्चना की थी। इस पर्वत पर इंद्र देव भी भ्रमण करने आते थे जिसके चलते इस पर्वत का नाम इंद्रकीलाद्री पड़ गया।

डिसक्लेमर

'इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी। ' 

Edited By: Shilpa Srivastava