मस्तक पर तीसरा नेत्र, गले में सर्प... मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर का वो अद्भुत रहस्य जो इसे बनाता है सबसे खास
मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर आस्था का केंद्र है, जहां दाईं सूंड वाले गणेश जी अपनी पत्नियों रिद्धि और सिद्धि के साथ विराजमान हैं।
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सिद्धिविनायक मंदिर का रहस्य (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
मुंबई के प्रभादेवी में स्थित है सिद्धिविनायक मंदिर।
यहां दाईं सूंड वाले गणेश जी रिद्धि-सिद्धि संग विराजते हैं।
भक्तों की सभी मुरादें पूरी करते हैं गणपति बप्पा।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने से भक्त के जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। लोग बप्पा के दर्शन करने के लिए मंदिर पहुंचते हैं।
वैसे तो देशभर में भगवान गणेश को समर्पित कई मंदिर हैं, लेकिन बप्पा का एक ऐसा मंदिर है, जहां दाईं सूंड वाले गणेश जी विराजमान हैं। इस मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि यहां आने वाले हर भक्त की मुरादें बप्पा पूरी करते हैं। हम बात कर रहे हैं मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर के बारे में, जो आस्था का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं इस मंदिर के रहस्यों के बारे में।
बेहद खास है मंदिर
भगवान गणेश को समर्पित सिद्धिविनायक मंदिर मुंबई के प्रभादेवी इलाके में स्थित है। भगवान गणेश की मूर्ति में उनकी सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है, जिसका शास्त्रों में अत्यंत विशेष महत्व है। भगवान गणेश के मस्तक पर तीसरा नेत्र है और गले में एक सर्प लिपटा हुआ है। इस मंदिर की एक यह भी विशेषता है कि भगवान गणेश अपनी दोनों पत्नियों रिद्धि और सिद्धि के साथ विराजमान हैं। इसलिए इस मंदिर में गणपति के साथ उनकी पत्नियों रिद्धि और सिद्धि के भी दर्शन होते हैं। सिद्धिविनायक मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने पर शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
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(Image Credit- Instagram)
बप्पा करते हैं सभी मुरादें पूरी
इस मंदिर में गणपति बप्पा के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भक्त सच्चे मन से बप्पा के दरबार में आता है, तो प्रभु उसकी सभी मुरादें पूरी करते हैं और भक्त पर गणेश जी की कृपा बरसती है।
कब जाएं सिद्धिविनायक मंदिर
वैसे तो इस मंदिर में दर्शन करने के लिए किसी भी दिन जा सकते हैं। इसके अलावा इस मंदिर में गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक विशेष उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान मंदिर में बहुत ही खास रौनक देखने को मिलती है। साथ ही सिद्धिविनायक मंदिर में अंगारकी और संकष्टी चतुर्थी के दिन अधिक संख्या में भक्त आते हैं।
18वीं शताब्दी में लक्ष्मण विठू पाटिल और उनकी धर्मपत्नी देउबाई पाटिल द्वारा स्थापित सिद्धिविनायक मंदिर आज अपने सबसे भव्य और विशाल स्वरूप में विद्यमान है। समय के साथ मंदिर में कई परिवर्तन किए गए।
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