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मध्य प्रदेश के इस मंदिर में नौ दिनों तक क्यों मनाया जाता है शरद पूर्णिमा महोत्सव? पढ़ें पौराणिक कथा

Published: Thu, 22 Oct 2026 09:11 AM (IST)

पन्ना के श्री प्राणनाथ जी मंदिर में 25 अक्टूबर 2026 को अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2026 महोत्सव मनाया जाएगा। ...और पढ़ें

पन्ना शरद पूर्णिमा महोत्सव

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2026) का त्योहार हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। इसे 'कोजागरी पूर्णिमा या कुमार पूर्णिमा' भी कहते हैं, जो हिंदू कैलेंडर के हिसाब से हर साल सितंबर से अक्टूबर महीने के बीच में पड़ता है।

इस साल शरद पूर्णिमा का उत्सव 25 अक्टूबर 2026, रविवार के दिन मनाया जाएगा। इस खास मौके पर मध्य प्रदेश की पवित्र नगरी पन्ना जिले के सुप्रसिद्ध मंदिर श्री प्राणनाथ जी मंदिर में शरद ऋतु के मौके पर शरद पूर्णिमा पर लाखों की संख्या में देश-विदेश से आए श्रद्धालु अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव में शामिल होते हैं।

इस नौ दिवसीय महोत्सव की शुरुआत विजयादशमी के मौके पर श्री खेजड़ा मंदिर में वीरा व तलवार उठाकर होती है। वीरा और तलवार इस बात का प्रतीक है कि संवत 1740 में खेजड़ा मंदिर परिसर में बुंदेलखंड की रक्षा के लिए महाराजा छत्रसाल को इसी विजयादशमी के दिन श्री प्राणनाथ जी ने वरदानी तलवार सौंपी थी और आशीर्वाद प्रदान किया था।

इस आशीर्वाद को प्राप्त करने के बाद महाराजा छत्रसाल जी ने पूरे बुंदेलखंड पर जीत हासिल कर ली और अपना साम्राज्य स्थापित कर पन्ना को इसकी राजधानी बनाई।

अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव पर क्या होता है?

अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव का मुख्य समारोह पूर्णिमा की रात में होता है। रात के करीब 12 बजे बंगला जी मंदिर में श्रीजी की सवारी ब्रम्हक चबूतरे पर लाई जाती है। पूर्णमासी की महारास का उत्सव पूरी रात चलता है।

श्रीजी की सवारी ब्रह्मा चबूतरे पर 5 दिन तक रूकी रहती है। इस दौरान पांच दिन तक गरबा समेत कई धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन चलता रहता है।

प्राणनाथ जी 5 दिनों के लिए रुके थे बंगला जी मंदिर में

शरद पूर्णिमा महोत्सव का पहला कार्यक्रम संवत 1740 में हुआ था। स्थानीय लोगों का मानना है कि श्री प्राणनाथ जी बंगला जी मंदिर में अपने 5 हजार समर्पित भक्त के साथ ठहरे थे। पूर्णिमा की चांदनी रात में वे समर्पित भक्तों के साथ श्रीकृष्ण द्वारा ग्वांलवालों व सखियों के साथ खेले जाने वाले महारास की चर्चा कर रहे थे।

इसी दौरान उनके साथ आए सुंदरनाथ ने महामति प्राणनाथ जी से अखंड महारास का अनुभव कराने का निवेदन किया तब पूनम की आधी रात शुरू होने वाली थी। इस पर महामति प्राणनाथ जी ने पांच हजार सुंदरसाथ (समर्पित भक्त) के साथ महारास खेलना शुरू कर दिया। यह महारास 5 दिनों तक बिना रुके और बिना थके चलता रहा। तभी से यह हर साल मनाया जाता है।

उत्सव के खास आकर्षण

इस उत्सव में कई तरह के कल्चरल और आध्यात्मिक गतिविधियां होती हैं। जिसमें शास्त्रीय संगीत और नृत्य प्रदर्शन, लोक कला और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, आध्यात्मिक और भक्ति कार्यक्रम, पारंपरिक व्यंजन और स्थानीय व्यंजन, हस्तशिल्प और हथकरघा और शरद पूर्णिमा की चांदनी में शाम का उत्सव शामिल है।

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