'ऊ' त्र्यंबकं यजामहे इस मृत्युजय महामंत्र की देवता त्र्यंबकेश्वर है
गंगा, गायत्री, गिरीजा ने गौरव किया हुआ ब्रम्हगिरी त्र्यंबकेश्वरकी शान है । ब्रम्हगिरीपर पाच शिखर है, उनके नाम है सदयोजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान । त्र्यंबकराज के सोनेरी मुख की पाँच मुखे है । ज्योर्तिलिंगका ही मंगलरुप ब्रम्हगिरी है । गंगा का मूल स्थान ब्रम्हगिरी है और शिवरुप ब्रम्हगिरीका
गंगा, गायत्री, गिरीजा ने गौरव किया हुआ ब्रम्हगिरी त्र्यंबकेश्वरकी शान है । ब्रम्हगिरीपर पाच शिखर है, उनके नाम है सदयोजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान । त्र्यंबकराज के सोनेरी मुख की पाँच मुखे है । ज्योर्तिलिंगका ही मंगलरुप ब्रम्हगिरी है । गंगा का मूल स्थान ब्रम्हगिरी है और शिवरुप ब्रम्हगिरीका साथी नीलपर्वत है ।
कहा जाता है नीलपर्वत पर नीलाबिंका याने रेणूका माता का वास्तव्य हुआ करता था । रेणूका परशुराम की जननी है । भगवान शिवाजीके अणूरेणू मे बसा करूणा अवतार रेणूका है । परशुरामजी को अपनी जननी और अवधूत दत्तजी का दर्शन यही हुआ था । रेणूका देवी का यह स्थान दत्तात्रय पावन सिध्दीक्षेत्र के नाम से मशहूर है । ब्रम्हगिरीके दक्षिण दिशा की और कोलांबा माता का मंदिर है । कोलांबा माता का मंदिर है । कोलांबा शिव की शक्तीका ही रुप माना जाता है।
कहा जाता है...... कोलांबा देवी शक्तीका गंगाद्वार है तो नीलांबा देवी विद्या का महाद्वार है । इन दोनो शक्तीयोका मातृकापीठ त्र्यंबकेश्वर है । 'त्रि' मतलब तीन, 'अबक' माने लोचन, तीन ऑखोवाले त्र्यंबकराज की ऑखे ब्रम्हा, विष्णु, महेश समान है । इस मूर्तिकी ऑखे खुली हुई है । तथा ऑखो की करूणा गंगा है ।
'ऊ' त्र्यंबकं यजामहे इस मृत्युजय महामंत्र की देवता त्र्यंबकेश्वर है । ब्रम्हानिष्ठ वसिष्ठ इस मंत्र को जापते थे । विश्वमित्र गायत्रीमंत्र जापते थे । गायत्रीदेवी का यह त्रिसंध्या क्षेत्र है । वसिष्ठ ऋषीका ब्रम्हतेज के क्षात्रतेज की प्राणप्रतिष्ठा मृत्युंजय मे है । मृत्युके समय तारक मंत्र उपदेश करनेवाली काशीनाथ् ही गौतमी के तीर पर बसे त्र्यंबकेश्वर मे आ बसे है । त्रि-देव तथा तीन अग्नियोंका दर्शन त्र्यंबकेश्वर मे होता है । पार्वती जिनकी अर्धांगिणी ब्रम्हा और विष्णू जिनके दुसरे अंग है वह त्र्यंबकनाथ है ।
नाथसंप्रदायमे त्र्यंबकेश्वर का महत्व अधिक है । इस सिध्दभूमी पर गोरक्षनाथ और निवृत्तीनाथ की गुरुकृपा है । त्र्यंबकमठ शैवोका आदरपात्र है । शैव ग्रंथकार सोमानंद अभिनव गुप्ताजीके पर दादाजी थे । सोमानंदके कारण यह बीज काश्मिर मे पहुंचा । सोमानंदका श्रीकृष्णशिवभी नागयोगीके परपुज्य थे । आद्य शंकराचार्यजीने भक्ती की योग की जोड देते हुये भागवत धर्म की स्थापना की । वारकरी समाज भी यह धर्म का पुरस्कर्ता है और त्याग वैराग्य की सीख देता है । ज्ञान के सुरज का दर्शन जिस त्र्यंबकराजा के चरण मे होता है । उन्हे कोटी कोटी प्रणाम ।
तव तत्वं न जानामि की शोह्यसि महेश्वर ।
या शोसि महादेव ताशाय नमोनम: ।।
गांग वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।
त्रिपुरारी शिरश्चारि पुनातुमाम् ।।
सिंहस्थ कहॉ नासिक या त्र्यंबकेश्वर मे ?
यह वाद-विवाद पंडितो में अनंतकाल से चला आ रहा है । इस कलह मे डुबे पंडितो को गंगा कहलाती है । प्रेम और ज्ञान की प्यास बुझानेवाली ज्ञानगंगा है । वही गोदावरी है । कलह शांती के लिए सिंहस्थस्नान है । कलह सभी जगह होता है । साधू-संत भी इससे परे नही । बहुत सालो पहले शैव - वैष्णव साधू कुशावर्त मे एकत्रित स्नान करते थे । परंतु स्नान करने के अग्रक्रम के कारण उनमे झगडा हो गया । यह झगडा इतना बढ गया की तलवार, भाले, त्रिशूल, लाठी का उपयोग एक दुसरे पर वार करने के लिये साधुओंने किया । कुशावर्तने खुन की होली देखी । तभी वैष्णवोंने नाशिक तथा शैवोने त्र्यंबकेश्वर मे स्नान करने का निर्णय लिया गया । सभी सांधूके आखाडे त्र्यंबकेश्वरमें ही रहते है । सिंहस्थ के शाही स्नान का मान कुशावर्त को तीर्थराज की उपाधी प्राप्त हुई । सांधूओ का इस दरम्यान का जलसा ज्ञान की शोभायात्रा है ।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।