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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 12, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Mahadev Temple: पांडवों से जुड़ा है इस मंदिर का इतिहास, समुद्र की ऊंची लहरों में जलमग्न हो जाते हैं शिवलिंग

By Suman SainiEdited By: Suman Saini
Published: Sat, 12 Aug 2023 02:38 PM (IST)

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Nishkalank Mahadev Temple पांडवों से जुड़ा है इस मंदिर का इतिहास।
Nishkalank Mahadev Temple पांडवों से जुड़ा है इस मंदिर का इतिहास।

HighLights

  1. पांडवों ने पापों मुक्ति पाने के लिए करवाया था इस मंदिर का निर्माण
  2. इस मंदिर शिव के दर्शन मात्र से होती है मोक्ष प्राप्ति
  3. स्वयंभू माने जाते हैं इस मंदिर के पांचों शिवलिंग

नई दिल्ली, अध्यात्म डेस्क। Nishkalank Mahadev Temple: निष्कलंक महादेव मंदिर में एक चौकोर मंच पर 5 अलग-अलग स्वयंभू शिवलिंग हैं और प्रत्येक के सामने एक नंदी की मूर्ति विराजमान है। यह मंदिर समुद्र में उच्च ज्वार के दौरान डूब जाता है और कम ज्वार के दौरान खुद को भव्यता से प्रकट करने के लिए उभर आता है। उच्च ज्वार के दौरान, शिवलिंग जलमग्न हो जाते हैं। इस दौरान केवल ध्वज और एक स्तंभ दिखाई देता है। आइए जानते हैं इस मंदिर का रोचक इतिहास।

पांडवों से जुड़ा है मंदिर का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर को पांडवों द्वारा बनवाया गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसे बनवाने के कारण यह था कि पांडवों द्वारा कुरुक्षेत्र युद्ध में सभी कौरवों को मारने के बाद, उन्हें अपने पापों के लिए दोषी महसूस होने लगा। अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए, पांडवों ने भगवान श्री कृष्ण से परामर्श किया, जिन्होंने उन्हें एक काला झंडा और एक काली गाय सौंपी और उनसे पीछा करने को कहा और कहा कि जब ध्वज और गाय दोनों सफेद हो जाएंगे, तो उन सभी के पाप मांफ हो जाएंगे। इसके बाद भगवान कृष्ण ने उन्हें भगवान शिव से क्षमा मांगने के लिए भी कहा।

पांडवों ने गाय का हर जगह पीछा किया जहां भी गाय उन्हें ले गई और कई वर्षों तक विभिन्न स्थानों पर ध्वज को मान्यता दी, फिर भी रंग नहीं बदला। अंत में, जब वे कोलियाक समुद्र तट पर पहुंचे, तो दोनों सफेद हो गए। वहां पांडवों ने भगवान शिव का ध्यान किया और अपने द्वारा किए गए पापों के लिए क्षमा मांगी। उनकी प्रार्थनाओं से प्रसन्न  होकर भगवान शिव ने प्रत्येक भाई को शिवलिंग रूप में दर्शन दिए। कहा जाता है कि यह पांचों शिवलिंग स्वयंभू हैं। इस सभी शिवलिंग के सामने नंदी की मूर्ति भी थी। पांडवों ने अमावस्या की रात को इन पांचों लिंगम को चौकोर स्थल पर स्थापित किया और इसे निष्कलंक महादेव नाम दिया जिसका अर्थ होता है बेदाग, स्वच्छ और निर्दोष होना।

हर साल लगता है मेला

इस स्थान पर 'भादरवी' नाम से प्रसिद्ध मेला श्रावण माह की अमावस्या की रात को आयोजित किया जाता है। मंदिर उत्सव की शुरुआत भावनगर के महाराजाओं द्वारा झंडा फहराकर की जाती है। जहां यह झंडा 364 दिनों तक खुला रहता है और अगले मंदिर उत्सव के दौरान बदला जाता है।

कब किए जाते हैं दर्शन

श्रद्धालु निम्न ज्वार के दौरान तट से नंगे पैर चलकर मंदिर के दर्शन करते हैं। मंदिर पहुंचने पर भक्त सबसे पहले एक तालाब में अपने हाथ-पैर धोते हैं, जिसे पांडव तालाब कहा जाता है, उसके बाद मंदिर के दर्शन करते हैं। ज्वार विशेष रूप से अमावस्या और पूर्णिमा के दिनों में सक्रिय होते हैं और भक्त इन दिनों ज्वार के गायब होने का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

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