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नर्मदा तट पर तर्पण से तृप्त होते हैं पूर्वज, क्यों दर्शन मात्र से पाप हरने वाली इस नदी का है खास धार्मिक महत्व?

Published: Mon, 05 Oct 2026 03:43 PM (IST)

नर्मदा नदी का प्राकृतिक और धार्मिक महत्व बेहद अद्भुत है। अमरकंटक से निकलने वाली इस नदी के कंकड़ में भी ...और पढ़ें

क्या कहता है स्कंद पुराण का ये श्लोक? (AI-Generated Image)

क्या कहता है स्कंद पुराण का ये श्लोक? (AI-Generated Image)

HighLights

  1. नर्मदा भारत की एकमात्र नदी है जो पूर्व से पश्चिम बहती है

  2. अमरकंटक से उद्गम, जहां प्राचीन कलचुरी कालीन मंदिर स्थित हैं

  3. यहां पितरों का तर्पण करने से अक्षय पुण्य मिलता है

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारत की सबसे प्रमुख और पवित्र नदियों में नर्मदा का स्थान बेहद अनूठा माना जाता है। यह देश की उन चुनिंदा नदियों में से एक है, जो रिफ्ट घाटी में बहने की वजह से पूर्व से पश्चिम की ओर यानी उल्टी दिशा में बहते हुए खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में जाकर मिलती है। नर्मदा सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति और इतिहास का एक खूबसूरत संगम है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक से होता है।

अमरकंटक में जहां से यह नदी निकलती है, वहां एक सफेद रंग का ‘नर्मदा उद्गम कुंड’ बना हुआ है। इस परिसर को नागपुर के भोंसले राजाओं और रीवा के महाराजा ने बनवाया था। इसी उद्गम स्थल के पास 11वीं सदी के प्राचीन ‘कलचुरी कालीन मंदिर’ भी मौजूद हैं, जिन्हें राजा कर्णदेव ने बनवाया था। इनमें पातालेश्वर महादेव, मछेंद्रनाथ और कर्ण मंदिर (त्रिमूखी मंदिर) काफी मशहूर हैं, जो उस दौर की बेहतरीन वास्तुकला की गवाही देते हैं।

पुराणों में क्या लिखा है?

‘त्रिभिः सारस्वतं तोयं सप्ताहेन तु यामुनम्. सद्यः पुनाति गांगेयं, दर्शनादेव नार्मदम्॥

स्कंद पुराण के रेवा खंड में इसका एक बहुत ही सुंदर जिक्र मिलता है। इस श्लोक के मुताबिक, जो पुण्य सरस्वती नदी में तीन दिन, यमुना में एक हफ्ता नहाने से मिलता है और गंगा के जल को छूने मात्र से मिलता है, वही पुण्य नर्मदा के केवल दर्शन कर लेने से ही मिल जाता है। भगवान शिव की मानस पुत्री होने के नाते इन्हें यह वरदान मिला था कि प्रलय आने पर भी इनका कभी नाश नहीं होगा। पत्थरों की टकराहट से होने वाली कल-कल की आवाज के कारण इन्हें ‘रेवा’ और मैकाल पर्वत से निकलने के कारण ‘मैकलसुता’ भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में यह इकलौती ऐसी नदी है, जिसकी महिमा बताने के लिए एक अलग ‘नर्मदा पुराण’ रचा गया है।

'नर्मदा का कंकड़-कंकड़ शंकर है'

आपने यह कहावत जरूर सुनी होगी। शिव जी के खास वरदान की वजह से इस नदी से निकलने वाले हर पत्थर को बिना किसी प्राण-प्रतिष्ठा के ही ‘नर्मदेश्वर शिवलिंग’ मानकर पूजा जाता है। इसके अलावा, पूरी दुनिया में नर्मदा ही एकमात्र ऐसा नदी है, जिसकी एक छोर से दूसरे छोर तक बाकायदा परिक्रमा की जाती है। यह परिक्रमा सिर्फ एक भौगोलिक सफर नहीं है, बल्कि इंसान के अहंकार को खत्म कर उसे ईश्वर से जोड़ने की एक तपस्या है, जिसे साधु-संतों की परंपरा में 3 साल, 3 महीने और 13 दिन में पैदल चलकर पूरा किया जाता है।

देवताओं की पूजा के साथ-साथ पितृपक्ष या श्राद्ध के लिए भी अमरकंटक और नर्मदा के तटों को बहुत पवित्र माना गया है। वायु पुराण में नर्मदा को पितरों की पुत्री (मानसी कन्या) कहा गया है। मान्यता है कि यहां विशेष तौर पर ‘आरंडी संगम’ या नर्मदा के किसी भी घाट पर काले तिल, कुश और जल से तर्पण करने पर पितरों को हमेशा के लिए तृप्ति मिल जाती है। यहां किए गए श्राद्ध का फल ‘अक्षय’ होता है यानी वह कभी नष्ट नहीं होता, और इंसान जीवन में सुख-शांति पाकर पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।