देवभूमि का सबसे रहस्यमयी बैजनाथ शिव मंदिर, जहां आज भी नहीं मनाया जाता दशहरा, क्या है इसका इतिहास और कथा
बैजनाथ शिव मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है, जहां रावण द्वारा शिव की तपस्या ...और पढ़ें

क्या है बैजनाथ शिव मंदिर का रहस्य

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिमाचल प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां देवी-देवताओं के कई ऐसे मंदिर हैं, जो किसी रहस्य या अन्य कारणों से प्रसिद्ध हैं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में एक ऐसा ही ऐतिहासिक मंदिर स्थित है, जिसका नाम बैजनाथ शिव मंदिर (Baijnath Shiva Temple) है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यहां दशहरा उत्सव को पारंपरिक रूप से नहीं मनाया जाता है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यहां लंकापति रावण ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए अपने नौ सिरों को काटकर हवन कुंड में अर्पित कर दिया था। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में हम आपको इस मंदिर से जुड़ी कथा और इतिहास के बारे में बताते हैं।
बैजनाथ शिव मंदिर की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, बैजनाथ शिव मंदिर का संबंध लंकापति रावण से है। इस पवित्र स्थान पर रावण ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी, जिससे उसे एक शक्तिशाली शिवलिंग प्राप्त हुआ था।, लेकिन भगवान शिव की एक शर्त थी कि शिवलिंग को जमीन पर नहीं रखना है। रास्ते में रावण ने उस शिवलिंग को एक चरवाहे को दे दिया और उस चरवाहे ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। जमीन पर रखते ही शिवलिंग स्थायी रूप से वहीं स्थापित हो गया। इसलिए शिव-भक्त रावण के सम्मान में यहां दशहरा उत्सव नहीं मनाया जाता है।
बैजनाथ शिव मंदिर का इतिहास
ऐसा बताया जाता है कि इस मंदिर को 1204 ई. में दो व्यापारियों द्वारा बनवाया गया था। मंदिर की दीवारों पर शिलालेखों से इस बात की पुष्टि होती है। बैजनाथ शिव मंदिर से पहले यहां एक प्राचीन शिव मंदिर था, जिसकी जगह पर इस नए मंदिर को बनाया गया। यह मंदिर मध्यकालीन उत्तर भारतीय नागर शैली की वास्तुकला के अनुसार बना है।
गर्भगृह में स्थापित है अर्धनारीश्वर शिवलिंग
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस मंदिर के गर्भगृह में अर्धनारीश्वर शिवलिंग स्थापित है। यह वही पवित्र शिवलिंग है, जो लंकापति रावण की कथा से जुड़ा है। गर्भगृह को इस तरह से बनाया गया है कि मंदिर में आने वाले भक्त आसानी से शिव जी के दर्शन कर सकें। बैजनाथ शिव मंदिर के चारों तरफ एक परिक्रमा मार्ग बनाया गया है। इस मार्ग पर घड़ी की सुई की दिशा परिक्रमा की जाती है। मंदिर के गर्भगृह के ऊपर एक शिखर है, जो घुमावदार है और लगभग 15 मीटर ऊंचा है। शिखर पर प्रतिहार-गुर्जर वास्तुकला में उकेरी गईं देवी-देवताओं की आकृतियां देखने को मिलती हैं।
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