जटोली शिव मंदिर: जहां पत्थरों से आती है डमरू की आवाज और कुंड के जल में छिपा है बीमारियों का इलाज!
हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित जटोली शिव मंदिर एशिया का सबसे ऊंचा शिव मंदिर है, जिसका निर्माण सिद्ध संत स्वामी श्री कृष्णानंद परमहंस के मार्गदर्शन में हुआ था।

जटोली शिव मंदिर सोलन (Picture Credits- AI Images)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित है एशिया का सबसे ऊंचा 'जटोली शिव मंदिर', जो सोलन से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मान्यताओं के मुताबिक, यह स्थान कभी भगवान शिव का विश्राम स्थल रहा था।
जटोली मंदिर का नाम भगवान शिव की लंबी जटाओं से पड़ा है। 1950 के दशक में सिद्ध संत स्वामी श्री कृष्णानंद परमहंस यहां आए थे। इस स्थान की दिव्य ऊर्जा से प्रभावित होकर उन्होंने यहां गहरी तपस्या की थी। वे एक गुफा में ध्यान करते थे, जो आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है। माना जाता है कि, जटोली शिव मंदिर निर्माण की योजना स्वामी जी के मार्गदर्शन में ही बनाई गई और साल 1974 में मंदिर की नींव रखी गई।
मंदिर को बनने में करीब 39 साल लग गए। 10 जुलाई, 1983 को स्वामी कृ्ष्णानंद परमहंस ने समाधि ली। इसके बाद मंदिर प्रबंधन समिति ने निर्माण कार्य जारी रखा और आखिरकार साल 2013 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ।
मंदिर का आकर्षण हैरान करने वाला
जटोली शिव मंदिर का मुख्य आकर्षण इसका ऊंचा और भव्य शिखर है। यह शिखर तीन पिरामिडनुमा स्तरों से बना हुआ है, जो ऊपर की ओर जाते हुए छोटा होते जाता है। मंदिर के शिखर का पहला स्तर सबसे चौड़ा है, जिस पर देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं, तरह-तरह के फूल और ज्यामितीय डिजाइनों की सुंदर नक्काशी की गई है।
दूसरा स्तर थोड़ा संकरा है, जिसमें अप्सराओं और गंधर्वों जैसी दिव्य आकृतियां बनाई गई हैं, जो पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक मानी जाती है। शिखर के शीर्ष स्तर पर अमलक स्थापित है और उसके ऊपर सुनहरा कलश रखा गया है। मंदिर का शिखर करीब 111 फीट ऊंचा है और कलश को मिलकर इसकी ऊंचाई करीब 122 फीट तक है।
मंदिर में स्थापित है स्फटिक का शिवलिंग
जटोली शिव मंदिर में भगवान शिव का स्फटिक से बना शिवलिंग स्थापित है। स्फटिक को शास्त्रों में सकारात्मक ऊर्जा का सबसे शुद्ध और पवित्र स्रोत माना जाता है।
यह सूर्य की किरणों को सबसे पहले आकर्षित करता है और उन्हें चारों ओर फैलाता है, जिससे मंदिर में पवित्रता, दिव्यता और ऊर्जा का एहसास होता है। इसके अलाव मंदिर के शिवलिंग पर चांदी की जलहरी भी सुसज्जित है, जो दिखने में काफी सुंदर लगती है।
मंदिर में पत्थरों से आती है डमरू जैसी आवाज
जटोली शिव मंदिर को बनाने के लिए प्रयोग लाए गए पत्थरों में एक खास रहस्य छिपा है। जब इन्हें हल्के हाथ से थपथपाया जाता है, तो इसमें से डमरू जैसी आवाज आती है। यह आवाज सुनने में बिल्कुल वैसी ही सुनाई देती है, जैसे भगवान शिव के डमरू से आती है।
मंदिर में स्थित चमत्कारी जल कुंड
जटोली शिव मंदिर परिसर के उत्तर-पूर्वी कोने में स्थित है जल कुंड जो बेहद पवित्र जलाशय माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, इसकी पवित्रता गंगा जल के समान है।
माना जाता है कि, प्राचीन काल में जटोली क्षेत्र में पानी की काफी कमी थी। इस समस्या से मुक्ति दिलाने के लिए स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी ने भगवान शिव को खुश करने के लिए कठिन तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव कृपा प्रकट हुई और स्वामी जी ने त्रिशूल से जमीन पर प्रहार किया तो जल की धारा फूट पड़ी।
तब से लेकर आज तक यह जल कुंड हमेशा भरा ही रहता है जिसके कारण आज तक जटोली में रहने वाले लोगों को आज तक पानी की दिक्कत नहीं हुई। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं का विश्वास है कि, इस कुंड का जल पीने से कई गंभीर रोगों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ ही यह भी कहा जाता है कि इस पवित्र जल में ऐसे औषधीय गुण मौजूद हैं, जो खासतौर पर स्किन रोगों को ठीक करने में सक्षम हैं।
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