इस तरह चैतन्य महाप्रभु ने प्राचीन वृंदावन का प्रकाश किया
आज कार्तिक पूर्णिमा है। चैतन्य महाप्रभु 500 साल पहले आज ही के दिन वृंदावन पधारे थे। इस अवसर पर आयोजित वृंदावन प्रकाश महोत्सव अपने उत्कर्ष पर है। पूरे वृंदावन में हरिनाम संकीर्तन की गूंज सुनाई पड़ रही है...
आज कार्तिक पूर्णिमा है। चैतन्य महाप्रभु 500 साल पहले आज ही के दिन वृंदावन पधारे थे। इस अवसर पर आयोजित वृंदावन प्रकाश महोत्सव अपने उत्कर्ष पर है। पूरे वृंदावन में हरिनाम संकीर्तन की गूंज सुनाई पड़ रही है...
चैतन्य महाप्रभु के नृत्य, संगीत और संकीर्तन की तुलना विद्वत् जनों ने एक ऐसे लोक से की है, जिसकी रीति-प्रीति आज भी प्रासंगिक है। लोक-मर्यादाओं को मिटाकर मोहन से मन लगाने का रास्ता महाप्रभु ने दिखाया। वृंदावन में उनके आगमन की पंचशती पूरी होने पर भक्तिभाव का वैसा ही लोक बसा हुआ है। देश और दुनिया से आए श्रद्धालुओं को अब घर- द्वार, कुटुंब-परिवार, संसारी विषय-भोग कुछ भी नहीं सुहा रहा है। हरिनाम संकीर्तन में इनकी इंद्रियां निर्विकार हो रही हैं। इंद्रिय सुख से ज्यादा आत्मिक सुख की आकांक्षा है। महाप्रभु द्वारा प्रकट किए गए वृंदावन धाम में भक्ति का सागर हिलोरें भर रहा है।
कार्तिक पूर्णिमा पर चैतन्य महाप्रभु के वृंदावन आगमन को पांच सौ साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में वृंदावन की गली-गली, मंदिर, देवालय, आश्रम, घर-घर और कण-कण में नाम संकीर्तन की धुन समाई है। भोर की पहली किरण से लेकर देर रात तक ‘हरे-कृष्णा... हरे-कृष्णा...’ के स्वर गूंज रहे हैं। नाचते-गाते हजारों भक्तों के झुंड न जाने किधर मुड़ जाएं, किस गली, देवालय और मंदिर से निकल जाएं, किसी को पता तक नहीं। एक राह चलते कब दूसरी गली में मुड़ जाएं, संकीर्तन के जादू में ऐसे मदमस्त भक्तों को वृंदावन के कण-कण में भगवान श्रीराधा-कृष्ण और उनके स्वरूप चैतन्य ही दिखाई दे रहे हैं। चैतन्य ही चैतन्य।
नाम में चैतन्य और काम चैतन्य। वृंदावन धाम में हरिनाम संकीर्तन का वातावरण वैसा ही है, जैसा पांच सौ साल पहले था। जिस तरह से पांच सौ साल पहले महाप्रभु जगन्नाथपुरी से वृंदावन आए थे, संतों का समूह उसी तरह महाप्रभु के चित्र को लेकर करीब 1800 किमी पैदल चलकर वृंदावन धाम पहुंचा है। संत कहते हैं कि हम प्रभु के साथ आए हैं। और जब महाप्रभु आएं तो नृत्य, संगीत और संकीर्तन की त्रिवेणी बहना लाजिमी ही है। वृंदावन प्रकाश महोत्सव इसी त्रिवेणी को हर्ष- उल्लास के साथ पूरी दुनिया में प्रवाहित कर रहा है। दुनिया भर में अपने हुनर की महारत हासिल करने वाली संकीर्तन मंडलियां महोत्सव के इस मंच पर मौजूद हैं। वृंदावन में देश के
कोने-कोने से संगीत की दुनिया के नायाब सितारे अपनी संस्कृति, संगीत और वाद्यों के साथ चैतन्य के नाम संकीर्तन को स्वर, लय और ताल में समाहित कर अपनी भावांजलि दे रहे हैं। करीब 80 देशों से तकरीबन 10
हजार श्रद्धालु प्रभु-प्रेम में निमग्न हैं। अक्रूर घाट से लेकर इमली तला की पवित्र भूमि, राधामदनमोहन, राधादामोदर, राधागोविंद, राधागोपीनाथ, राधा श्यामसुंदर, राधारमण और गोकुलानंद मंदिर हर ओर नाम संकीर्तन की धुन नजर आ रही है। जगह-जगह उत्सव- महोत्सव..., हर जगह एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां।
चैतन्य महाप्रभु ने उस प्राचीन वृंदावन का प्रकाश किया, जिसकी धरती पर भगवान श्रीकृष्ण और उनकी आह्लादिनी शक्ति राधाजी ने अपनी लीलाएं रचाईं, भगवान ने गोपियों के साथ महारास किया, चीर घाट पर गोपियों का चीर हरण किया, कुंज-गलियों में माखन चुराया, कालीदह पर कालियमर्दन कर ब्रजवासियों को जीवन दान दिया। अगर चैतन्य वृंदावन की धरती पर न आते तो वृंदावन आज मिथक ही रह जाता। ऐसा मानना न केवल उन चैतन्य अनुयायियों का है, बल्कि वृंदावन की इस पवित्र भूमि पर कदम रखने वाले हर भक्त की अनुभूति ऐसी ही प्रतीत होती है।
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