सती के शरीर का कुछ भाग यहां हुआ था अंतरध्यान
हर वर्ष की तरह श्री हुद्धमाता की यात्रा चार जुलाई को किश्तवाड के गौरी शंकर मंदिर से रवाना होगी। यात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में है। सोमवार को शुरू होने के बाद यात्रा पहले दच्छन सौन्दर गांव पहुंचेगी। वहां से सभी भक्तजन पांच जुलाई को हुद्ध माता के दरबार की तरफ प्रस्थान करेंगे।
किश्तवाड। हर वर्ष की तरह श्री हुद्धमाता की यात्रा चार जुलाई को किश्तवाड के गौरी शंकर मंदिर से रवाना होगी। यात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में है। सोमवार को शुरू होने के बाद यात्रा पहले दच्छन सौन्दर गांव पहुंचेगी। वहां से सभी भक्तजन पांच जुलाई को हुद्ध माता के दरबार की तरफ प्रस्थान करेंगे।
पुराणों के अनुसार एक बार दक्ष प्राजापति ने गंगा किनारे हरिद्वार में बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। इसमें सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया किंतु भगवान शंकर व माता सती को इस यज्ञ में नहीं बुलाया। देवी देवताओं को आकाश मार्ग से जाते देख माता सती ने भगवान शंकर से कहा कि ये देवी देवता मेरे पिता के यज्ञ में भाग लेने के लिए जा रहे है। हमें भी जाना चाहिए परंतु भगवान शंकर ने कहा कि हमें निमंत्रण नहीं आया है, इसलिए बिना बुलाए जाने पर अपमान होगा। माता सती बात न मानकर चली गई।
माता सति जब अपने पिता दक्ष के घर पहुंची तो वहां उसका कोई आदर सत्कार न हुआ। माता तथा बहनों ने भी उनसे कोई बात तक नहीं की, दूसरे देवी-देवताओं को सम्मानित व अपना अपमान होते देख माता सती ने हवन कुंड में छलांग लगा दी, लेकिन अग्नि देवता ने उन्हें छुआ तक नहीं। इसके बाद माता सती ने योगाग्नि से अपने शरीर को भस्म कर दिया। जब महादेव को इस सारी बात का ज्ञात हुआ तो वह यज्ञशाला पहुंचे और माता सती के जलते शव को उठाकर हिमालय की घाटियों में घूमते रहे अंत में माता के स्थान पर पहुंचे तथा माता सती की देह के साथ अंतर ध्यान हो गए।
संस्कृत में हुद्ध का अर्थ है हवन करना, बलिदान करना अपने शरीर को स्वाह करना। चूंकि पार्वती सती हुई और उनके शरीर को कुछ भाग यहां अंतर ध्यान हो गया इसलिए यह स्थान हुद्धमाता के नाम से जाना जाता है।
माता को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने तथा समाज में धार्मिक जागृति लाने हेतु इस यात्रा का आयोजन वर्षों से हो रहा है। दर्शनीय स्थल
कैकूट: प्राचीन काल से दरबार के नीचे बना मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामजी का मंदिर।
दरबार: माता का मंदिर यहां पर नाग देवता के साक्षात दर्शन होते है, यहां एक छोटी गुफा है जिसमें प्राकृतिक रूप बने शिवलिंगों पर गुफा में कामधेनु के थनों जैसे आकृति वाली पत्थरों से श्वेत अमृत की बूंदे गिरती है।
माता त्रिसंध्या: थोडी दूरी पर दिन में तीन बार बहने वाली नदी है, इस नदी को माता त्रिसंध्या नदी कहते है जिसके दर्शन मात्र से जन्म जन्म के पाप मिट जाते है और स्नान करने से जीवन का उद्धार होता है। इस नदी का जल दरिया से मिलने के बाद नीचे से उपर की और सूखने लगता है। इस अलौकिक नजारे का दर्शन हर कोई करने को आतुर रहता है। दूधगंगा: सतरचीन के मैदान पर ब्रहम पर्वत के दामन में सर्पाकार बहने वाली जल सरिता, यहां जल उबलता जैसा प्रतीत होता है।
ब्रह्म सरोवर: ब्रह्म पर्वत की गोद में शीतल जल की झील भांति-भांति के पुष्पों से सुशोभित बेहद सुंदर है।
ब्रह्म पर्वत: यह वह पर्वत है जो हर समय एक तरफ से बादलों से घिरा रहता है। इस भगवान ब्रह्मा जी का निवास स्थान माना जाता है।
यात्रा विवरण 4 जुलाई (सोमवार):श्री गौरी शंकर मंदिर किश्तवाड से 12 बजे पूर्वाहन यात्रा आरंभ होगी। 5 जुलाई (मंगलवार): यात्रा इखाला से सुबह पांच बजे पैदल चलकर एक बजे सौन्दर पहुंचेगी। जहां श्री राधाकृष्ण मंदिर से माता की पवित्र छड़ी शोभायात्रा के रूप में रवाना होगी। 6 जुलाई (बुधवार): पवित्र छड़ी विराट माता मंदिर दिलगूठ से सुबह नौ बजे आगे की यात्रा पर रवाना होकर गौकूट पहुंचेगी। 7 जुलाई (वीरवार): पवित्र छड़ी सुबह पांच बजे गौकूट से प्रस्थान करेगी और दोपहर 12 बजे कैकूठ पहुंचेगी। यहां श्रद्धालु त्रिसंध्या, ब्रह्म सरोवर व दूधगंगा आदि स्थानों का दर्शन करेंगे। 8 जुलाई (शुक्त्रवार): यात्रा सुबह छह बजे कैकूठ से चलकर हुद्धमाता के भवन पहुंचेगी। जहां पूजा अर्चना व दर्शनों के दर्शनों के बाद यज्ञ की पूर्ण आहुति देकर वापस लौटेगी।
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