Indira Ekadashi Katha: व्रत भंग होने पर यमलोक में थे इंद्रसेन के पिता, कैसे एकादशी ने दिलाया उन्हें मोक्ष?
आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत पितृ पक्ष में पड़ने के कारण अत्यंत फलदायी माना जाता ...और पढ़ें
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इंदिरा एकादशी पर जरूर करें इस कथा का पाठ (Picture Credit: AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi 2026) के नाम से जाना जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, आज यानी 6 अक्टूबर को यह एकादशी व्रत किया जा रहा है। पितृ पक्ष में पड़ने वाली इंदिरा एकादशी का व्रत अत्यंत फलदायी साबित होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो साधक इस दिन विधिपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना और व्रत करता है, उसे जीवन में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है और शुभ फलों की प्राप्ति होती है। पूजा के दौरान एकादशी व्रत की कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि कथा का पाठ करने से साधक को व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। इसलिए इस दिन एकादशी कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए।
इंदिरा एकादशी व्रत कथा (Indira Ekadashi Vrat Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार, माहिष्मती पुरी में इंद्रसेन नाम का एक राजा था। वह जगत के पालनहार भगवान विष्णु का परम भक्त था और धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करता था। एक समय ऐसा आया जब देवर्षि नारद इंद्रसेन की सभा में आए। राजा ने सभा में देवर्षि नारद का स्वागत किया और उनके आने का कारण पूछा। देवर्षि नारद ने बताया कि कुछ समय पहले वे यमलोक गए थे।
राजा इंद्रसेन के पिता ने भेजा संदेश
वहां पर उनकी मुलाकात राजा इंद्रसेन के पिता से हुई। उन्होंने राजा के लिए एक संदेश भेजा है। उन्होंने कहा कि एकादशी का व्रत भंग होने की वजह से उन्हें अभी तक मुक्ति नहीं मिल पाई है और इसी वजह से उन्हें यमलोक में ही रहना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि आप मेरे पुत्र से कहना कि यदि वह आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करेगा, तो उस व्रत के पुण्य से मुझे मुक्ति मिल जाएगी।
राजा इंद्रसेन ने किया एकादशी व्रत
देवर्षि नारद की बात सुनकर राजा इंद्रसेन ने एकादशी व्रत की विधि के बारे में पूछा। इसके बाद राजा इंद्रसेन ने आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत किया और पितरों के निमित्त मौन रहकर ब्राह्मण भोज और गौ दान किया। राजा इंद्रसेन द्वारा इस व्रत को करने से उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिली और बैकुंठ लोक की प्राप्ति हुई।
इसके बाद से ही इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी पड़ा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इंदिरा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करने से पितरों को मुक्ति मिलती है और उनकी कृपा बरसती है।
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