शादी का पंजीकरण जरूरी है। भारत में अब लगभग हर धर्म के लोगों के लिए इसे अनिवार्य कर दिया गया है। इसके बावजूद लोग जागरूक नहीं हैं। शादी का रजिस्ट्रेशन क्यों जरूरी है? इसके क्या लाभ हैं और इसकी प्रक्रिया क्या है, जानें इस लेख में।

शादी का रजिस्ट्रेशन करवाना बेहद जरूरी है। इसके अलावा भारत में अब सभी धर्मों (सिख धर्म को छोड कर) के लोगों के लिए शादी का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। इसके बावजूद लोगों को इसकी प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं है, जिस कारण शादी का सर्टिफिकेट हासिल करने में देरी लगती है। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता कमलेश जैन कहती हैं, 'शादी के बाद बैंक में जॉइंट अकाउंट खुलवाने, स्पाउज वीजा हासिल करने, जॉइंट प्रॉपर्टी लेने जैसे तमाम कार्यों के लिए शादी का प्रमाण-पत्र जरूरी है। मैरिज सर्टिफिकेट कई तरह की परेशानियों से भी मुक्त कर सकता है। इसका सबसे ज्य़ादा फायदा स्त्रियों को है। शादी में धोखाधडी, बाल विवाह और तलाक जैसे तमाम मामलों में मैरिज सर्टिफिकेट होने से स्त्री के अधिकार सुरक्षित रह पाते हैं।

तीन साल पहले तक भारत में हिंदू मैरिज एक्ट और मुस्लिम विवाह अधिनियम के तहत विवाह का पंजीकरण अनिवार्य नहीं समझा जाता था। पारंपरिक रीति-रिवाजों से शादी कर लेना ही काफी था, मगर कई बार पारंपरिक विवाहों में कुछ रस्में नहीं निभाई जातीं या गवाह की जरूरत पडऩे पर उनकी संख्या कम हो जाती है। ऐसे कई मामलों में विवाह से मुकरने जैसी घटनाएं भी सुनने में आई हैं। जैसे मंदिर में पुजारी के सामने किए गए प्रेम विवाहों में माला बदलने से ही शादी हो जाती है, लेकिन किसी भी विपरीत स्थिति में ऐसी शादी को अमान्य होते देर नहीं लगती। बाल विवाह होने की स्थिति में भविष्य में कभी शादी को चुनौती देनी हो तो इसके लिए शादी का प्रमाण होना जरूरी है।

रजिस्ट्रेशन का फायदा

विवाह का कानूनी प्रमाण है मैरिज सर्टिफिकेट। अगर शादी के बाद नाम या सरनेम नहीं बदलना चाहते तो शादी से संबंधित सभी कानूनी अधिकार और लाभ दिलाने में इससे मदद मिलती है। जॉइंट बैंक अकाउंट खुलवाने, लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसीज लेने के अलावा राष्ट्रीयकृत बैंक से लाभ लेने में भी इसकी बडी भूमिका होती है। यदि पति सरकारी नौकरी में है तो कई सुविधाएं दिलाने में भी यह सर्टिफिकेट सहायक होता है। इसके अलावा दंपती में से कोई एक धोखाधडी करे तो इस प्रमाण-पत्र की मदद से थाने में रिपोर्ट करवाई जा सकती है। तलाक के लिए अपील करनी हो या गुजारा भत्ता लेना हो, हर स्थिति में मैरिज सर्टिफिकेट काम आता है। पासपोर्ट बनवाने, वीजा हासिल करने जैसे तमाम कार्यों के लिए वैवाहिक प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है।

कैसे हो पंजीकरण

हिंदू विवाह अधिनियम (1955) या विशेष विवाह अधिनियम (1954) में से किसी एक के तहत शादी को पंजीकृत किया जा सकता है। हिंदू विवाह अधिनियम केवल हिंदुओं पर लागू होता है, जबकि स्पेशल मैरिज एक्ट भारत के समस्त नागरिकों पर लागू होता है।

शादी का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए कुछ दस्तावेजों का होना जरूरी है।

1. पति-पत्नी के हस्ताक्षर वाला आवेदन-पत्र

2. आयु या जन्म का प्रमाण-पत्र

3. आवासीय प्रमाण-पत्र (लडकी शादी से पहले जहां रहती हो-वहां का आवासीय प्रमाण-पत्र )

4. शादी के फोटोग्राफ, निमंत्रण पत्र, मंदिर में शादी हुई हो तो पुजारी द्वारा जारी प्रमाण-पत्र

5. यदि विदेशी से शादी हुई हो तो उसके देश की एंबेसी द्वारा 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट।

6. यदि लडकी शादी के बाद सरनेम बदलना चाहती है तो एक नॉन-ज्यूडिशियल स्टैंप पेपर, जिस पर पति-पत्नी द्वारा अलग-अलग एफिडेविट हो। इन सभी दस्तावेजों पर राजपत्रित अधिकारी का हस्ताक्षर और मुहर जरूरी है।

शादी का रजिस्ट्रेशन कराने जा रहे हों तो इन निर्देशों का पालन करें-

1. जिस भी जगह रहते हों, वहां के कलक्टर दफ्तर में जाकर आवेदन-पत्र प्राप्त करें।

2. आवेदन-पत्र को सावधानी से भरें। सभी बातों का सही-सही जवाब दें।

3. शादी के बाद नाम या सरनेम में कोई बदलाव हुआ हो तो आवेदन-पत्र में नया नाम दर्ज करें। इसका प्रमाण संलग्न करें।

4. इस फॉर्म पर तीन गवाहों के हस्ताक्षर करवाएं, जोकि आपके रिश्तेदार या दोस्त हो सकते हैं। गवाहों का विवरण भी फॉर्म में भरना होगा। मसलन, आपका उनसे क्या रिश्ता है, वे कौन हैं, कहां रहते हैं, क्या करते हैं। उनका पूरा पता और फोन नंबर्स का होना भी जरूरी है।

रजिस्ट्रेशन ऑफिस में सभी दस्तावेजों को प्रस्तुत करना होगा। वहां सारे डॉक्यूमेंट्स की जांच होगी। हस्ताक्षर करवाने के बाद इन पर रजिस्टे्रशन ऑफिस की मुहर लगेगी और इसकी प्रतिलिपियां निकाली जाएंगी।

विशेष विवाह अधिनियम

भारत के समस्त नागरिक इसके तहत शादी पंजीकृत कर सकते हैं, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों। इसके तहत उस रजिस्ट्रेशन ऑफिस में आवेदन करना होता है, जहां पति-पत्नी में से कोई एक पिछले छह महीनों से रह रहा हो। इसके बाद रजिस्ट्रेशन सेंटर के बोर्ड पर शादी से संबंधित सूचना लगा दी जाती है, ताकि वर-वधू के किसी भी संबंधी को कोई आपत्ति हो तो वे इसे दर्ज कर सकें। अगर कोई आपत्ति प्राप्त नहीं होती तो सूचना प्रकाशित होने के एक महीने बाद विवाह संपन्न माना जाता है। यदि आपत्ति मिलती है तो विवाह अधिकारी जांच के बाद निर्णय लेता है कि शादी होगी या नहीं।

आवेदन-पत्र जमा करने के लगभग 30 दिन के भीतर प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है। मैरिज रजिस्ट्रेशन में बहुत पैसा खर्च नहीं होता, हालांकि पिछले तीन वर्षों में इसकी फीस थोडी बढी है और अलग-अलग राज्यों में यह अलग-अलग हो सकती है। सामान्य रूप से इसमें दस रुपये का चालान, दस-दस रुपये का पति व पत्नी का एफिडेविट और 20-25 रुपये नोटरी की फीस ली जाती है। अगर नोटरी से रजिस्ट्रेशन नहीं कराना चाहते तो तहसीलदार या ज्यूडिशियल ऑफिसर भी ऐसा कर सकता है। जिले का कलक्टर मैरिज ऑफिसर होता है, हालांकि वह चाहे तो एसडीएम को यह जिम्मेदारी सौंप सकता है।

ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन

अब कई राज्यों में ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन शुरू हो चुका है। इसके लिए हिंदू विवाह पंजीकरण सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है। आवेदन के लिए विभागीय वेबसाइट पर जाकर फॉर्म को डाउनलोड किया जा सकता है। सारे जरूरी दस्तावेज स्कैन करके आवेदन-पत्र के साथ संलग्न किए जा सकते हैं। धीरे-धीरे यह प्रक्रिया कई जगह लागू हो रही है। इससे घर बैठे व्यक्ति शादी रजिस्टर करा सकता है।

मैरिज एक्ट और रजिस्ट्रेशन

हिंदू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 8 में शादी का रजिस्ट्रेशन व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है। मुस्लिम मैरिज में भी कुछ राज्यों की नियमावली में रजिस्ट्रेशन व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर है। ईसाई विवाह अधिनियम 1872, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 और पारसी मैरिज एंड डिवोर्स एक्ट 1936 के तहत मैरिज रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है। जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम मैरिज रजिस्ट्रेशन एक्ट 1981 के अनुसार निकाह के 30 दिन के भीतर मैरिज रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है।

इंदिरा राठौर

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