वर्ष 2003 में आई पिंजर विभाजन की पृष्ठभूमि पर बनी प्रामाणिक और मार्मिक फिल्म थी। अमृता प्रीतम के उपन्यास पिंजर पर आधारित इस फिल्म का निर्देशन डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने किया था। उस साल इसे राष्ट्रीय एकता का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। मनोज बाजपेयी और उर्मिला मातोंडकर अभिनीत यह फिल्म उल्लेखनीय पीरियड फिल्मों में से एक है।

नफरत और बदले की कहानी

पिंजर पूरो की कहानी है। विभाजन के पहले वह आज के पाकिस्तान के सीमावर्ती गांव में रहती है। समृद्ध जमींदार परिवार की बडी बेटी पूरो की शादी रामचंद से होनी है, लेकिन उसके पहले ही रशीद उसका अपहरण कर लेता है। रशीद से उनकी पुश्तैनी दुश्मनी है। पूरो के परिवार ने कभी रशीद के परिवार की एक औरत को अगवा और बेइज्जत किया था। रशीद पर दबाव है कि वह इसका बदला ले। पूरो के साथ रहते-रहते रशीद उसे प्यार करने लगता है। एक रात पूरो भाग जाती है, लेकिन उसके माता-पिता उसे स्वीकार नहीं करते। उन्हें डर है कि रशीद का परिवार पूरे परिवार की हत्या कर देगा। पूरो उदास मन से रशीद के पास लौटती है। रशीद उससे कोई सवाल नहीं करता। इसी बीच विभाजन होता है। विभाजन के बाद की त्रासदी में उसके मंगेतर रामचंद की बहन का अपहरण हो जाता है। रशीद की मदद से पूरो उसे आजाद कराती है। अंतिम दृश्य में पूरो का भाई त्रिलोक उससे भारत चलने का आग्रह करता है। रामचंद उसे स्वीकारने को तैयार है, मगर पूरो तय करती है कि वह पाकिस्तान में रशीद के साथ ही रहेगी। रशीद और पूरो परिवार को विदा कर भारी मन से साथ लौटते हैं।

विभाजन की पीडा

डॉ. द्विवेदी कहते हैं, एक-दो प्रयासों के बाद मैं ऐसी फिल्म निर्देशित करना चाह रहा था, जिसे अपने अनुभव, कौशल और ज्ञान के साथ पेश कर सकूं। मुख्यधारा की चालू फिल्मों में मेरी रुचि शुरू से ही नहीं थी। मैंने शुरुआत एक कमर्शियल फिल्म के सहायक निर्देशक के तौर पर की थी, लेकिन इसके बाद मैंने राह बदल ली। मुझे इस कृति के बारे में फिल्म के कला निर्देशक मुनीष सप्पल ने बताया। मैंने उपन्यास पढा तो लगा कि इस पर मार्मिक फिल्म बन सकती है।

चाणक्य से मशहूर हुए डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी की रुचि साहित्य, इतिहास और पीरियड में रही है। उन्होंने पहली फिल्म के रूप में पिंजर ही क्यों चुनी? इस पर वह कहते हैं, भारत-पाकिस्तान विभाजन और हिंदू-मुसलमान समस्या पर राजनीतिक बातें तो होती रही हैं, लेकिन फिल्म व साहित्य में इन पर कम ध्यान दिया गया है। पिंजर दोनों समस्याओं को छूती है। दो लोग अपनी जिद से एक रिश्ते और विचार को कायम करते हैं। करुणा व प्रेम से देश, धर्म, कौम, जाति के विद्वेष को ख्ात्म किया जा सकता है। अमृता प्रीतम ने इस विषय को उपन्यास में अच्छी तरह चित्रित किया। पिंजर असहज स्थितियों में जन्मे प्रेम की कहानी है।

साहित्य से फिल्म का सफर

आमतौर पर साहित्यकार अपनी कृतियों पर बनी फिल्मों से असंतुष्ट रहते हैं। वे चाहते हैं कि पटकथा लेखन में उनका सहयोग लिया जाए। डॉ. द्विवेदी ने अमृता प्रीतम को कैसे उपन्यास के अधिकार देने के लिए राजी किया? डॉ. द्विवेदी कहते हैं, उन्होंने मेरा टीवी धारावाहिक चाणक्य देखा था। मैंने स्क्रिप्ट लिखने के बाद उन्हें भेजी और बताया कि जरूरी परिवर्तन किए हैं, आप देख लें। उनका जवाब था, मैंने उपन्यास लिख कर अपना काम पूरा किया। मैं जानती हूं कि साहित्य व सिनेमा अलग-अलग माध्यम हैं। सिनेमा के लिए आपको परिवर्तन करने पडे होंगे। मुझे आप पर विश्वास है। आप अपनी विधा के माहिर हैं। मैं स्क्रिप्ट देखना और पढना नहीं चाहती..। मुझे ख्ाुशी है कि मैं उपन्यास के करीब रहा।

उस समय पिंजर दर्शकों को अधिक पसंद नहीं आई थी। बाद में डीवीडीज के जरिये इसके असंख्य दर्शक बने। विभाजन पर यह प्रामाणिक पीरियड फिल्म मानी जाती है। लगभग नौ साल गुजर चुके हैं। डॉ. द्विवेदी कहते हैं, मैं दर्शकों को दोष नहीं देना चाहता। आमतौर पर वे मनोरंजन चाहते हैं। मैं मानता हूं कि सिनेमा का पहला उद्देश्य मनोरंजन होना चाहिए। सामाजिक सरोकार दूसरा उद्देश्य हो सकता है। पिंजर में यह पहला उद्देश्य हो गया था। फिल्म लंबी थी। अंत में उदास करती है। मोहल्ला अस्सी के लेखन-निर्देशन में मैंने इससे सबक लिया। यह काशीनाथ सिंह के उपन्यास काशी का अस्सी पर आधारित है।

कुछ ऐसे हुई तैयारी

पिंजर पीरियड लुक की वजह से सराही गई। कला निर्देशक मुनीष सप्पल बताते हैं, मैंने अमृतसर और लाहौर के सेट तैयार किए थे। मुंबई की फिल्म सिटी में सात एकड में यह सेट लगा था, जिसे 400 मजदूरों की 40 दिन की मेहनत के बाद तैयार किया गया था। सेट और कॉस्ट्यूम को उसी पीरियड का रूप दिया गया था। मैंने पंजाब की यात्राएं कीं। संग्रहालयों से शोध सामग्री ली, सहयोगियों की मदद से उन्हें तैयार किया। फिल्म सिटी में पिंजर के छह सेट लगाए गए थे। गांव के वास्तविक दृश्यों के लिए राजस्थान के नवलगढ व गंगानगर में शूटिंग की गई थी।

पिंजर में पूरो का महत्वपूर्ण किरदार उर्मिला मातोंडकर ने निभाया था। राम गोपाल वर्मा की रंगीला से उनकी रंगीली छवि बन चुकी थी। पिंजर की पूरो उस छवि के विपरीत है। उर्मिला मातोंडकर उन दिनों को याद करती हैं, डॉ. द्विवेदी ने मुझे स्क्रिप्ट के साथ कथासार भी भेजा था। बाद में वे पूरो का स्केच और कंप्यूटर द्वारा मुझे उस स्केच में डालकर तस्वीरें ले आए थे। उनकी तैयारी देख कर मैं दंग रह गई। सेट तैयार हुआ तो दो दिन मैं वहीं घूमती रही, अपनी कल्पना से पूरो को रचती रही। डा. द्विवेदी से अपनी शंकाएं भी जाहिर करती रही। उन जैसी तैयारी बहुत कम निर्देशक करते हैं। उन्होंने मेरी इमेज बदल दी। अपने चरित्र की तैयारी के बारे में ज्यादा नहीं बता सकती। यह एक आंतरिक प्रक्रिया होती है। हर अभिनेत्री अपने अनुभवों से चरित्र में ढलती है। इसे शब्दों में बताना मुश्किल है। मेरी कोशिश रही कि डॉ. द्विवेदी की अपेक्षाओं पर खरी उतरूं।

संबंधों का अनोखा पहलू

रशीद की भूमिका निभा चुके मनोज बाजपेयी पिंजर को जीवन की महत्वपूर्ण फिल्म मानते हैं। इसके लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला था। वे बताते हैं, रशीद संबंध में रहते हुए भी पूरो से अपेक्षा नहीं रखता। एक प्रसंग में तो वह पूरो को सीमा पार छोडना चाहता है, जबकि उसे लगता है कि पूरो वहां स्वीकार नहीं की जाएगी। बाद में पूरो ही उसके प्रेम के आगे समर्पण कर देती है। रशीद की करुणा उसमें प्रेम का संचार करती है। यह किरदार मुश्किल था। फिल्म में ऐक्शन और घटनाएं नहीं, इमोशंस हैं। फ्रेम में कुछ न करते हुए भी अपनी मौजूदगी दर्शाना व दृश्य को प्रभावशाली बनाना मुश्किल होता है।

पिंजर को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के फिल्म निदेशालय ने देश की 100 श्रेष्ठ फिल्मों में चुना है। भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष पूरे होने पर यह फिल्म देश के विभिन्न शहरों में दिखाई गई। अजय ब्रह्मात्मज

अजय ब्रह्मात्मज