सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। मशहूर कवि अवतार सिंह 'पाश की सिर्फ इस एक पंक्ति में ही जिंदगी का बहुत बडा फलसफा छिपा है। चाहे समय का कोई भी दौर रहा हो, दुनिया के हर कोने में युवा वर्ग हमेशा अपने सपनों के साथ जीता रहा है। वह केवल अपने बारे में नहीं सोचता, उसकी सामाजिक और राजनैतिक चेतना हर पल उसे तत्पर रखती है, देश और समाज के लिए कुछ अच्छा सोचने और करने को। उसके सपनों का फलक बहुत बडा है। उसकी जागती आंखों में बेशुमार सपने बसे हैं। एक सपना चांद को छू लेने का तो एक इंद्रधनुष को जमीन पर उतार लाने का..पर सभी सपने सच होते हैं क्या? फिर भी उत्साही युवा मन नाकामी से नहीं डरता। तभी तो किसी भी बडे बदलाव में युवा शक्ति हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाती आ रही है। हमसे है जमाना अगर हम अपने देश की बात करें तो स्वाधीनता संग्राम के दौर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और खुदीराम बोस जैसे युवा नेताओं की कुर्बानी को हम कैसे भुला सकते हैं। युवावस्था उम्र का वह दौर है, जब व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से सबसे ज्य़ादा सक्रिय होता है। देश और समाज के विकास में उसकी भागीदारी सबसे ज्य़ादा होती है। चाहे वह डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या प्रशासनिक अधिकारी जैसे किसी उच्च पद पर आसीन हो या फिर किसी गांव का किसान-मजदूर ही क्यों न हो। हर स्तर पर वह देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। कडी प्रतिस्पर्धा के इस दौर में आज का युवा स्वरोजगार के नए अवसर ढूंढ कर न केवल अपनी तरक्की सुनिश्चित करता है बल्कि अपने जैसे दूसरे युवाओं के लिए भी रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध करा रहा है। ख्रासतौर पर आइटी प्रोफेशनल्स स्टार्टअप के माध्यम से युवा पीढी के करियर को एक नई दिशा दे रहे हैं। नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनी (नैसकॉम) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में स्टार्टअप की वार्षिक ग्रोथ 40 प्रतिशत है और इस मामले में भारत की गिनती विश्व के तीन अग्रणी देशों में होती है। सपने देखें तभी तो सच होंगे कामयाबी के लिए निश्चित रूप से कडी मेहनत की जरूरत होती है लेकिन जीवन में आगे बढऩा है तो हमारे पास अपने लक्ष्य को लेकर कुछ सपने भी होने चाहिए। इस संदर्भ में महान वैज्ञानिक और देश के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने एक बहुत अच्छी बात कही थी कि असल में सपने वो नहीं होते जिन्हेंं हम नींद में देखते हैं बल्कि हमारे सपने ऐसे होने चाहिए जो हमारी रातों की नींद छीन लें। कहने का आशय यह है कि किसी भी बडे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उसके प्रति हमारे मन में बेइंतहां पैशन और उत्साह होना चाहिए। इस संबंध में दिल्ली की युवा इंटरप्रोन्योर इशिता स्वरूप कहती हैं, 'किसी भी प्रोजेक्ट की सफलता के लिए सबसे जरूरी यह है कि उसके लिए हमारे मन में इतना जुनून हो कि हम दिन-रात सिर्फ उसी के बारे में सोचते रहें। पूंजी की कमी कोई बडी समस्या नहीं है, मैंने अपनी एक सहेली के साथ मिलकर सिर्फ एक छोटे से कमरे और उधार के लैंडलाइन फोन से अपने काम की शुरुआत की। हमने लगातार कडी मेहनत की। हमारी ऑनलाइन फैशन स्टोर 99lables.com उसी मेहनत का नतीजा है। इसके तहत हम फैशन और लाइफस्टाइल से जुडी 99 चीजों की ऑनलाइन सेल लगाते हैं। अब हमारी यह साइट युवाओं के बीच काफी पॉपुलर हो चुकी है। जब मैंने अपने काम की शुरुआत की थी तो कई लोगों ने मुझे समझाने की कोशिश की। उनका कहना था कि भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का कोई भविष्य नहीं है क्योंकि यहां के लोग चीजों को हाथ से छूकर देखने-परखने के बाद ही ख्ररीदने का निर्णय लेते हैं। फिर भी मैं अपने इरादे पर अडिग रही क्योंकि मुझे पूरा विश्वास था कि समय के साथ ग्राहकों का नजरिया जरूर बदलेगा। वाकई ऐसा लगता है कि मेरा सपना साकार हो गया। कामयाबी के लिए कशमकश यह जरूरी नहीं है कि हमेशा लोगों के सभी सपने साकार हो जाएं। इसी वजह से आज की युवा पीढी कोई भी निर्णय लेने से पहले कई बार सोचती है। यह देखकर कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि आज के युवा बहुत ज्य़ादा कंफ्यूज्ड़ हैं। अपने करियर और जीवन से जुडे महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनके मन में बहुत ज्य़ादा दुविधा रहती है इसीलिए वे अकसर अपना निर्णय बदलते रहते हैं। आजकल मेडिकल और इंजीनियरिंग का करियर छोडकर संगीत, अभिनय और साहित्य के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाले युवाओं की तादाद तेजी से बढ रही है। ऐसा क्यों हो रहा है? इस संबंध में मनोवैज्ञानिक सलाहकार डॉ.अशुम गुप्ता कहती हैं, 'पुराने समय में लोगों के सामने ज्य़ादा विकल्प नहीं होते थे। हाई स्कूल की पढाई करने के बाद उनके सामने यह स्पष्ट होता था कि अगर वे साइंस स्ट्रीम में हैं तो डॉक्टर या इंजीनियर बनेंगे, अगर कॉमर्स के स्टूडेंट हैं तो बैंकिग या अकाउंट्स से जुडी सरकारी जॉब में जाएंगे। आट्र्स से जुडे छात्र ग्रेजुएशन के बाद या तो भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के लिए यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी में जुट जाते थे या जिन्हें पढऩे में और ज्य़ादा रुचि होती थी, वे मास्टर्स डिग्री लेने के बाद शिक्षा के क्षेत्र में चले जाते थे, पर अब ऐसा नहीं है। आज हर तरह की रुचि से जुडे युवाओं के सामने केवल रोजगार ही नहीं, बल्कि स्वरोजगार के भी हजारों विकल्प मौजूद हैं। इसी वजह से उन्हें अपने लिए सही करियर का चुनाव करने से पहले बहुत सोचना पडता है। यहां बात केवल करियर की नहीं, बल्कि निजी जीवन से जुडे छोटे-छोटे मसलों पर भी युवाओं में ऐसी ही दुविधा नजर आती है। चाहे शॉपिंग मॉल हो या रेस्तरां, अब हर जगह लोगों के सामने इतने आकर्षक विकल्प मौजूद होते हैं कि उनकी आंखें चुंधिया जाती हैं। वे समझ नहीं पाते कि उन्हें अपने लिए क्या चुनना चाहिए? ऐसे में थोडी देर के लिए भ्रमित होना स्वाभाविक है पर इसका मतलब यह नहीं है कि आज की युवा पीढी हमेशा दुविधाग्रस्त रहती है। अगर ऐसा होता तो युवक-युवतियां कम उम्र में ही इतनी बडी उपलब्धियां हासिल नहीं कर रहे होते। निर्णय लेने से पहले थोडा रुकने या बाद में उसे बदल देने में कोई बुराई नहीं है। किसी भी मुद्दे से जुडे दोनों पहलुओं को अच्छी तरह जांचने-परखने के बाद अगर कोई निर्णय लिया जाए तो उसमें गलती होने की आशंका नहीं रहती। बढ रही हैं चुनौतियां आज कडी प्रतिस्पर्धा के इस युग में युवा पीढी को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पडता है। सही मायने में यही बातें उन्हें आगे बढऩे का हौसला भी देती हैं। इस संबंध में देश के अग्रणी करियर कोचिंग इंस्टीट्यूट फिट्जी नोएडा के सेंटर हेड रमेश बटलिश कहते हैं, 'आजकल पेरेंट्स की अपेक्षाएं बहुत ज्य़ादा बढ गई हैं। इसके अलावा छात्र पीयर प्रेशर की वजह से भी तनावग्रस्त रहते हैं। खुद को साबित करने के लिए उन्हें कडी मेहनत करनी पडती है। आजकल इंजीनियरिंग, खासतौर पर इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं। तभी तो आज के पेरेंट्स अपने बच्चों को इंजीनियर बनाने का सपना देखते हैं। हमारे पास कोचिंग के लिए कई ऐसे छात्र भी आते हैं, जिनकी इस क्षेत्र में कोई रुचि नहीं होती। फिर भी वे सिर्फ पेरेंट्स के दबाव की वजह से यहां आते हैं। ऐसे में हम छात्रों का एप्टीट्यूड टेस्ट लेकर उन्हें अपनी रुचि और क्षमता के अनुरूप करियर चुनने की सलाह देते हैं। इसीलिए छात्रों के साथ उनके माता-पिता की भी काउंसलिंग होती है। ताकि वे यह समझ पाएं कि उन्हें अपनी संतान के माध्यम से अधूरे सपने पूरे करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। मैं इस क्षेत्र में पिछले पंद्रह वर्षों से कार्यरत हूं और अपने अनुभवों के आधार पर यह कह सकता हूं कि आज की युवा पीढी पहले की तुलना में ज्य़ादा परिपक्व, क्रिएटिव और कॉन्फिडेंट है। सबसे अच्छी बात यह है कि वह जोखिम उठाने से नहीं डरती। अगर कोई निर्णय गलत हो भी जाए तो नई पीढी के लोग उस पर पछताने में ज्य़ादा वक्त बर्बाद नहीं करते, बल्कि वे पुरानी विफलताओं को भुलाकर दोबारा नए उत्साह के साथ अपने काम में जुट जाते हैं।' बुरी नहीं है व्यावहारिकता युवाओं के बारे में आजकल अकसर लोग यही कहते हैं कि हमारी नई पीढी कुछ ज्य़ादा ही व्यावहारिक हो गई है। वह दिल के बजाय दिमाग से निर्णय लेती है। अगर तार्किक दृष्टि से देखा जाए तो भावुक होकर कोई भी गलत निर्णय लेने के बजाय तथ्यों को यथार्थ की कसौटी पर परखने में कोई बुराई नहीं है। आज के युवा किसी भी समस्या के बारे में भावुकता भरी दार्शनिक बातें करने के बजाय सीधे उसका हल ढूंढने में यकीन रखते हैं। इस संबंध में एमबीए के छात्र अभय जुनेजा कहते हैं, 'प्यार अंधा होता है। आज के संदर्भ में यह कहावत पूरी तरह गलत साबित होती है। आज का प्यार आंखों वाला और समझदार है। हमें पहले से ही इस बात का अंदाजा हो जाता है कि हमें किसके साथ अपनी दोस्ती आगे बढानी है और हमारे लाइफ पार्टनर में कौन से गुण होने चाहिए। हमारी जेनरेशन के लोग इन बातों का ध्यान रखकर ही लव मैरिज का निर्णय लेते हैं। आज के माता-पिता को भी अपनी संतान की पसंद और निर्णय पर पूरा भरोसा होता है। तभी तो वे उन्हें खुद अपना जीवनसाथी चुनने की आजादी देते हैं। आपने भी नोटिस किया होगा कि आज के जमाने में प्रेम विवाह के लिए किसी को घर से भागने की जरूरत नहीं पडती और न ही पुराने समय की तरह अमीर लडकियों को किसी गरीब से प्यार होता है। आज प्यार के मामले में भी लोग अपने स्टेटस का पूरा ख्याल रखते हैं, जिसमें कोई बुराई नहीं है।' बात बराबरी की यहां बराबरी का मामला केवल लाइफ पार्टनर चुनने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सबसे अच्छी बात यह है कि जीवन के हर मोर्चे पर लडकियां भी लडकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तेजी से आगे बढ रही है। आर्मी, इंजीनियरिंग, बैंकिंग, साइंस और स्पोट्र्स जैसे पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्रों में भी स्त्रियों की भागीदारी तेजी से बढ रही है। इतना ही नहीं आजकल बडी कंपनियों के बोर्डरूम में भी चंदा कोचर, किरण मजूमदारशॉ, इंदिरा नूई और अरुंधती भट्टाचार्य जैसी शख्सियतों ने न केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, बल्कि लोग उनके कुशल नेतृत्व की प्रशंसा भी कर रहे हैं। आज की आत्मनिर्भर लडकियां स्वाभिमान के साथ सिर उठा कर जीना सीख चुकी हैं। एक सौंदर्य प्रसाधन के विज्ञापन में पिता अपनी बेटी को विवाह प्रस्ताव के बारे में बताते हैं तो बेटी कहती है, 'पापा मैं शादी करूंगी लेकिन कुछ साल बाद जब मेरी सैलरी भी उस लडके के बराबर हो जाएगी। जोडी तभी अच्छी लगेगी जब मामला इक्वल-इक्वल होगा।' लडकियों की सोच में यह सकारात्मक बदलाव निश्चित रूप से सराहनीय है। हालांकि आज भी युवाओं के लिए पुरानी पीढी के मन में स्टीरियो टाइप नेगटिव इमेज बनी हुई है। ज्य़ादातर पुराने लोग युवाओं को गैर जिम्मेदार और अनुशासनहीन मानते है। उन्हें ऐसा लगता है कि नई पीढी का जीवन केवल लेट नाइट पार्टीज और मौज-मस्ती तक ही सीमित है। कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं पर इसके आधार पर पूरी पीढी को गलत नहीं ठहराया जा सकता। फुर्सत के पलों को अपने ढंग से एंजॉय करने वाले युवा अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझते हैं। जिम्मेदार हैं युवा सामाजिक सरोकारों के मामले में हर स्तर पर युवाओं की सजगता और जिम्मेदारी दिखाई देती है। गरीबी, अशिक्षा, प्रदूषण और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं को लेकर युवा वर्ग सोशल मीडिया पर न केवल अपनी चिंता जाहिर करता है, बल्कि निजी जीवन में भी इन समस्याओं को दूर करने के लिए तत्पर रहता है। दिल्ली के अंशु गुप्ता को सामाजिक कार्यों के लिए 2015 में मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। वह बताते हैं, 'सर्दियों में फुटपाथ पर रहने वाले लोगों की तकलीफ देखकर मेरे मन में उनकी मदद करने का ख्याल आया। शुरुआत में मैं अपने घर से कुछ पहनने लायक पुराने कपडों को एक बैग में जमा करता और उन्हें जरूरतमंदों के बीच बांट आता था। फिर कुछ दोस्त और परिचित भी मेरी मदद के लिए आगे आए। इस तरह हमारी संस्था 'गूंज' का जन्म हुआ, जो देश के विभिन्न प्रांतों में जरूरतमंदों के लिए कपडे, बर्तन, किताबें और आवश्यक घरेलू वस्तुएं उपलब्ध कराती है।' आ अब लौट चलें भारतीय समाज अभी बहुत बडे बदलाव से गुजर रहा है। आज से दो-तीन दशक पहले तक नई पीढी पश्चिमी जीवनशैली से बहुत ज्य़ादा प्रभावित थी। तब युवाओं की सोच आत्मकेंद्रित हो रही थी और संयुक्त परिवार टूट रहे थे। उच्च शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टर और इंजीनियर तेजी से अमेरिका और यूरोप का रुख कर रहे थे लेकिन घर से दूर रहने के बाद उन्हें अपने देश की याद आई। लोग जल्दी ही यह समझ गए कि केवल पैसा ही सब कुछ नहीं है। खुश रहने के लिए अपनों का साथ भी चाहिए। इसीलिए आजकल विदेश से उच्च शिक्षा हासिल करने वाले लोग भी अपने शहरों/गांव में लौटकर वहां के विकास के लिए काम कर रहे हैं। अब नई पीढी अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों को समझने की कोशिश में जुटी नजर आती है। आजकल विश्वविद्यालयों में लोककथाओं, पारंपरिक चित्रकलाओं और लोकगीतों पर शोध करने वाले वैसे युवा आपको बहुत आसानी से मिल जाएंगे, जो अपनी परंपराओं की अनमोल विरासत को संजोना चाहते हैं। तसवीर का दूसरा रुख इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज की युवा पीढी बहुत तेजी से विकास के रास्ते पर आगे बढ रही है लेकिन इस आकर्षक तसवीर का दूसरा पहलू यह भी है कि गांव में रहने वाले युवाओं को आज भी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें विकास की मुख्य धारा में शामिल करने के लिए देश के शहरी युवाओं को भी आगे आना होगा। सबसे अच्छी बात यह है कि थोडी ही सही पर उनकी यह कोशिश नजर आ रही है। मेहनती और जिम्मेदार हैं युवा मैं इस बात में यकीन रखती हूं कि अगर हम अच्छा सोचें तो हमारे साथ भी अच्छा ही होगा। मैं हमेशा चुनौतियों का डटकर सामना करने के लिए तैयार रहती हूं। हमारे समाज में अकसर लोग लडकियों को कमजोर समझ कर उन्हें हिकारत की दृष्टि से देखते हैं। मुझे यह बात सख्त नापसंद है। मुझे खुद पर पूरा विश्वास है कि अगर मैं ईमानदारी से मेहनत करूंगी तो हर हाल में कामयाबी हासिल होगी। मैंने 16 साल की उम्र से ही काम करना शुरू कर दिया था। इसलिए मेरे अनुभवों का दायरा बहुत विस्तृत है। मुझे यह मालूम है कि मेरे लिए क्या सही और क्या गलत है। मैं अपनी क्षमता और सीमाओं को अच्छी तरह पहचानती हूं। इसलिए चाहे प्रोफेशनल हो या पर्सनल लाइफ, मेरा कोई भी निर्णय गलत साबित नहीं होता। जैसा कि आपको मालूम ही है कि मेरा कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं है। फिर भी अपने सतत प्रयास से मैं निरंतर आगे बढती रही। मुझे ऐसा लगता है कि भारतीय समाज तेजी से बदल रहा है। अब यहां भी पश्चिमी देशों की तरह युवा अपने कॉलेज की पढाई के साथ ही पार्ट टाइम जॉब शुरू कर देते हैं। कम उम्र में आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल करने की वजह से युवाओं का आत्मविश्वास बढ रहा है। आज का युवा मेहनती और मल्टीटास्किंग है। वह पढाई और जॉब से जुडी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभा रहा है। अच्छी बात यह है कि अब नई पीढी परिवार की अहमियत समझने लगी है। [नीतू चंद्रा, अभिनेत्री] साहसी हैं आज के युवा युवाओं के बारे में अकसर यही कहा जाता है कि वे कंफ्ज्य़ूड और धैर्यहीन हैं। हमेशा सपनों की दुनिया में जीते हैं। हर जमाने में पुरानी पीढी के लोग युवाओं के बारे में ऐसी ही बातें करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज के युवा जब अपनी प्रौढावस्था में पहुंचेंगे तो वे भी नई पीढी के लिए ऐसा ही कहेंगे। अपने करियर के शुरुआती दिनों में मुझे भी यही सब सुनने को मिलता था। आज भी लोगों की सोच में ज्य़ादा बदलाव नहीं आया है। हां, तकनीकी विकास की वजह से बहुत सारी बातें बदल चुकी हैं। आज के युवा बहुत स्मार्ट और आत्मविश्वास से भरपूर हैं पर ऐसा नहीं है कि वे सारे फैसले सही लेते हैं। कई बार ओवर कॉन्फिडेंस की वजह से उनसे गलतियां भी हो जाती हैं। फिर भी सबसे अच्छी बात यह है कि उनमें रिस्क लेने की हिम्मत है। राह में आने वाली बाधाएं उनका मनोबल नहीं तोड पातीं। उन्हें लीक से हटकर सोचना और चलना आता है। बस, उन्हें थोडा सा मार्गदर्शन चाहिए तो वे असंभव को भी संभव बना सकते हैं। युवावस्था उम्र का वह दौर है, जब इंसान सबसे ज्य़ादा ऊर्जावान होता है। अगर युवा वर्ग अपनी क्षमताओं का उपयोग सकारात्मक दिशा में करे तो वह निश्चित रूप से कामयाब होगा। [रवीना टंडन, अभिनेत्री] साथ न छोडें सपनों का बचपन से ही मेरा सपना था कि मैं आर्मी में जाकर अपने देश की सेवा करूं पर कुछ पारिवारिक कारणों की वजह से वह अधूरा रह गया। फिर भी मैं निराश नहीं हुआ। ऐक्टिंग भी मेरी हॉबी रही है और मैं अपने इस सपने को हर हाल में पूरा करने की कोशिश में जुट गया और मुझे इसमें कामयाबी भी मिली। मेरा मानना है कि हमें अपने सपनों का साथ नहीं छोडऩा चाहिए। अगर सच्चे दिल से मेहनत की जाए तो कामयाबी जरूर मिलती है। यह देखकर मुझे बहुत दुख होता है कि ग्लोबलाइजेशन के बाद नई पीढी अपनी जडों से दूर होती जा रही है। उसके लिए अपनी पहचान बनाए रखना सबसे बडी चुनौती है। कडी प्रतिस्पर्धा के इस दौर में आगे बढऩे के लिए धैर्यपूर्वक मानसिक तैयारी बेहद जरूरी है। युवा भी समय की इस मांग को बखूबी समझते हैं। इसी वजह से वे मुश्किल हालात से जरा भी नहीं घबराते, बल्कि राह में आने वाली चुनौतियों का सामना करते हुए आगे बढते हैं। [निकेतन धीर, अभिनेता] जरूरत है मजबूत इरादे की मेरा मानना है कि जीवन में कामयाबी हासिल करने के लिए मजबूत इरादे का होना बहुत जरूरी है। इस मामले में मेरे इरादे बेहद मजबूत हैं। छोटी उम्र से ही कुकिंग, पेंटिंग और म्यूजिक मेरी हॉबीज रही हैं। व्यस्तता के बावजूद आज भी मैं अपनी रुचि से जुडे इन कार्यों के लिए समय जरूर निकालती हूं। आज इंटरनेट जैसे संचार के साधन हमारी जीवनशैली की जरूरत बन चुके हैं पर मैं सोशल साइट्स पर बहुत ज्य़ादा वक्त बर्बाद नहीं करती। नई पीढी अपना सारा समय इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के साथ बिताना पसंद करती है। सोशल साइट्स पर अजनबियों से तो दोस्ती बढ रही है लेकिन हम अपनों से दूर होते जा रहे हैं। नई पीढी अपने नैतिक और सामाजिक मूल्य भूलती जा रही है। युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि तरक्की का अर्थ केवल पैसे कमाना नहीं है , बल्कि सच्चाई के रास्ते पर चलते हुए हमें अपने देश और समाज के हितों का भी ख्याल रखना चाहिए। [कविता कौशिक, टीवी कलाकार] युवाओं को दोषी न ठहराएं आज के युवाओं में सब्र की कमी है। वे हर काम जल्दबाजी में करना चाहते हैं। मैं मानता हूं कि उनके सामने कई तरह की दिक्कतें आती हैं पर अपने सपनों को साकार करने के लिए कडी मेहनत के साथ धैर्य रखना बहुत जरूरी है। मैं भी लंबे संघर्ष के बाद यहां तक पहुंचा हूं। मैं हमेशा आगे बढऩे का ही सपना देखता रहता हूं। मेरा मानना है कि अपना एक लक्ष्य हासिल करने के बाद ही हमें किसी नए प्रोजेक्ट पर काम शुरू करना चाहिए। एक सपना पूरा होते ही हमें अपने दूसरे सपने की तरफ बढऩा चाहिए। मैंने कम उम्र में ही ऐक्टिंग और थिएटर की शुरुआत की। धीरे-धीरे ही सही पर मैं अपनी मंजिल की ओर बढऩे लगा। समय के हर दौर में कुछ गैर जिम्मेदार लोग होते हैं लेकिन केवल उनकी वजह से पूरी पीढी को दोषी ठहराना गलत है। आज के नौजवान भी बेहद इंटेलीजेंट, मेहनती और ईमानदार हैं। जीवन की राह में चाहे कितनी ही बडी चुनौतियां क्यों न हों पर हमें सपने को साकार करने के लिए खुद को एक मौका जरूर देना चाहिए। [दिलीप जोशी, टीवी कलाकार] मिल ही गई मंजिल अपने सपने को साकार करने के लिए मुझे बहुत कडा संघर्ष करना पडा पर वह कहावत है न कि मेहनत का फल मीठा होता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। मुझे केवल अपनी मेहनत के बल पर पहचान मिली। मैं लगातार अपने सपनों का पीछा करता रहा और अंतत: मुझे मेरी मंजिल मिल ही गई। शायद आपको यकीन न हो पर यह सच है कि कुल 275 बार ऑडिशन देने के बाद मुझे 'बालिका वधू' में पहला ब्रेक मिला। मैं मूलत : उज्जैन का रहने वाला हूं। मेरा सपना था, अभिनय की दुनिया में अपनी पहचान बनाना पर इसके लिए मैं अपने पिता को परेशान नहीं करना चाहता था। इसलिए मुंबई आने के बाद शुरुआती दौर में छोटे-छोटे काम भी कर लेता था। मसलन, किसी सीरियल के दृश्य में भीड का हिस्सा बनना, सिर्फ एक वाक्य का डायलॉग बोलना आदि। इसके लिए मुझे हजार-दो हजार रुपये मिल जाते थे। इन छोटे-छोटे कामों से भी मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता था पर उस दौरान बहुत निराशा भी होती थी। ऐसा लगता था कि आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा? फिर भी अपने सपने को साकार करने के लिए मैं जी जान से जुटा रहा। मेरा मानना है कि जिंदगी सभी को आगे बढऩे का मौका देती है। बस, हमें नाकामियों से घबराना नहीं चाहिए। [शशंक व्यास, टीवी कलाकार] इंटरव्यू: मुंबई से प्राची दीक्षित , दिल्ली से सीमा झा