जेएनएन, पटियाला। पंजाब के कई विश्वविद्यालयों की वित्तीय हालत खराब हो गई है। सरकारी ग्रांट पर्याप्त न होने के कारण जिस यूनिवर्सिटी के पास छात्रों के प्रवेश के अलावा आय का अन्य साधन नहीं है वह बड़े वित्तीय संकट में फंस गईं हैं। सबसे खराब वित्तीय हालत पटियाला स्थित पंजाबी यूनिवर्सिटी की है। 150 करोड़ रुपये के कर्ज में डूबी यूनिवर्सिटी के पास मुलाजिमों को वेतन देने के लिए भी पैसा नहीं है।

चार साल पहले बठिंडा में खोली गई महाराजा रंजीत सिंह टेक्निकल यूनिवर्सिटी सरकार से ग्रांट न मिलने से अब तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई है। लुधियाना स्थित पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है।

पंजाबी यूनिवर्सिटी में नियमित वेतन के लिए मुलाजिम कई महीने से प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार से 300 करोड़ की ग्रांट मांगी गई थी लेकिन मात्र 20 करोड़ रुपये ही मिले। इससे परेशान वाइस चांसलर डा. बीएस घुम्मन ने मंगलवार को पद से इस्तीफा दे दिया। इस यूनिवर्सिटी के कर्ज में डूबने की शुरुआत वर्ष 2010 में हो गई थी जब पहली बार बैंक से 15 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था।

पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना में शिक्षक व गैर शिक्षक वर्ग के मुलाजिमों ने 38 दिन से वेतन में संशोधन, नियमित भर्ती, पदोन्नति और पुरानी पेंशन स्कीम शुरू करने को लेकर मोर्चा खोल रखा है। वीरवार को दो गेटों पर ताला लगाकर वीसी व अन्य अधिकारियों को दाखिल होने से रोकने तक की कोशिश की गई।

यूनिवर्सिटी की वित्तीय स्थित अच्छी नहीं है। पिछले कई साल से शिक्षक व गैर शिक्षक वर्ग में 50 फीसद पद खाली पड़े हैं। सरकार को कई बार पदों को भरने के लिए लिखा गया है लेकिन स्वीकृति नहीं मिली है। खाली पदों के कारण यूनिवर्सिटी के शोध कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। शिक्षक वर्ग में 1056 पद स्वीकृत हैं लेकिन आधे खाली हैं। गैर शिक्षक वर्ग में जूनियर क्लर्क और असिस्टेंट के 267 में से 140 पद भी भरे हुए हैं। सीनियर असिस्टेंट के 64 पद खाली हैं। यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डा. बलदेव सिंह ढिल्लों का कहना है कि करीब 50 फीसद स्टाफ कम है।

गडवासू (गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी) वर्ष 2006 में अस्तित्व में आई और तभी से इसमें 30 से 35 फीसद स्टाफ कम है। कांट्रैक्ट मुलाजिमों से काम चलाया जा रहा है। खाली पदों पर नियमित भर्ती नहीं करने के पीछे फंड की कमी ही एक बड़ी वजह है। हालांकि यूनिवर्सिटी के वीसी डा. इंद्रजीत सिंह का कहना है कि सरकार से बजट मिल जाता है। कांट्रैक्ट पर मुलाजिम रखे हैं। रिसर्च प्रोजेक्टों से भी यूनिवर्सिटी को पैसा मिल जाता है।

महाराजा रंजीत सिंह टेक्निकल यूनिवर्सिटी की घोषणा 2015 में की गई। कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद यूनिवर्सिटी कैंपस के लिए 50 करोड़ रुपये देने की घोषणा की लेकिन अब तक पहली किश्त के रूप में 25 करोड़ रुपये ही मिले हैं। इमारत के अलावा और कुछ भी नहीं बना पाया है। कक्षाएं आज भी ज्ञानी जैल सिंह कालेज की पुरानी इमारत में ही लग रही हैं। 

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