विदेशों में ऑनलाइन बिक रहे काऊ डंग केक नाम से गाय के गोबर के उपले
गाय के उपले अब आनलाइन भी मिलने लगे हैं। इससे जुड़ी कंपनियां इन्हें भारत ही नहीं विदेश में भी बेच रही हैं। धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ किचन गार्डनिंग के लिए भी इनकी डिमांड है।
पटियाला [राकेश भारतीय]। नोएडा से अपने बेटे के साथ पटियाला में आकर बसे मुरलीधर को घर में धार्मिक आयोजन के लिए गाय के उपले की जरूरत पड़ी, तो काफी तलाश के बाद भी इंतजाम नहीं हो पाया। लिहाजा उन्होंने इंटरनेट पर सर्च किया तो पता चला कि अमेजन, स्नैपडील व ई-बे जैसी कई बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियां ऑनलाइन उपले बेच रही हैं। उन्होंने ऑनलाइन ऑर्डर किया और उपलों का पैकेट उनके घर पहुंच गया। एक डिब्बे में 12 उपले और कीमत 275 रुपये।
सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यह कारोबार काफी फल-फूल रहा है। इससे जुड़ी कंपनियां इन्हें भारत ही नहीं विदेश में भी बेच रही हैं। धार्मिक आयोजनों के साथ-साथ किचन गार्डनिंग के लिए भी इनकी डिमांड है। जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड सहित कई देशों में किचन गार्डनिंग के लिए उपलों का इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा पूजा के लिए एनआरआइज विशेष रूप से गाय गोबर से बने उपलों की काफी डिमांड कर रहे हैं।
100 से 500 रुपये में उपलब्ध
अमेजन पर काऊ डंग केक के नाम से गाय के गोबर के 12 उपले 275 रुपये में, 8 उपलों वाला पैकेट 199 रुपये में, जबकि 24 उपलों वाला पैकेट 495 रुपये में उपलब्ध है। इसके अलावा शॉप क्लूज डॉट कॉप पर 100 रुपये में एक पैकेट बेचा जा रहा है। इतना की कंपनियां 100 फीसद शुद्ध उपलों का दावा कर अपनी ब्रांडिंग कर रही हैं। इनकी पैकिंग भी काफी आकर्षक ढंग से की गई है।
दिवाली के लिए मिल रहे ऑर्डर
एक कंपनी के सेल्स मैनेजर ने बताया कि दिवाली के लिए उन्हें काफी ऑर्डर मिल रहे हैं। मॉडल टाउन निवासी चार्टर्ड अकाउंटेंट सुनील मित्तल के बताया कि उनके घर में हर माह कोई न कोई धार्मिक आयोजन होता है। पहले उन्हें काफी परेशानी होती थी, लेकिन अब आसानी से ऑनलाइन ऑर्डर पर उपलब्ध हैं। उनका कहना है कि भारतीय कंपनियां इस सुविधा को उपलब्ध नहीं करवा रही हैं।
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स्वदेशी जागरण मंच ने किया स्वागत
स्वदेशी जागरण मंच के विभाग संयोजक वरुण गोयल ने इस पहल का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि गाय की महत्ता को दुनियाभर में स्वीकार किया गया है। यह खुशी की बात है कि लोग ऑनलाइन मांग कर रहे हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि स्वदेशी कंपनियां भी आगे आएंगी, ताकि युवाओं को रोजगार मिल सके।
किचन गार्डनिंग के लिए इस्तेमाल
कृषि वैज्ञानिक डॉ. रविंदर पाल चट्ठा ने कहा कि विदेशों में किचन गार्डनिंग के लिए इसका काफी इस्तेमाल हो रहा है। लोग रासायनिक खाद के दुष्प्रभाव से परिचित हैं। इसलिए इनकी डिमांड बढ़ रही हैं। टॉप सॉयल तैयार होने में 50 साल लगते हैं। रासायनिक खाद के प्रयोग से एक इंच टॉप सॉयल 16 वर्ष में नष्ट हो रही है। गाय के गोबर से बनी खाद जहां इसे रोकने में 50 गुना सहायक है।
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