सुखकारी होता है संतों का मिलना और दुर्जनों का बिछुड़ना : पं.पवन कुमार
। पंडित पवन गौतम ने प्रवचन करते हुए कहा कि समाज में संत चलते-फिरते तीर्थ हैं जो समाज को पवित्र करने के लिए पृथ्वी पर घूमते रहते हैं।

संवाद सहयोगी, मोगा
श्री सनातन धर्म प्राचीन शिव मंदिर में जन्माष्टमी पर्व के उपलक्ष्य में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में पंडित पवन गौतम ने प्रवचन करते हुए कहा कि समाज में संत चलते-फिरते तीर्थ हैं जो समाज को पवित्र करने के लिए पृथ्वी पर घूमते रहते हैं।
उन्होंने कहा कि तीर्थ स्नान हमारे तन को पवित्र करता है परंतु संतजनों का मिलना हमारे तन, मन एवं धन को पावन करता है। संत जनों का जीवन सैनिकों की भांति होता है। सैनिक देश की सीमा की रक्षा अपने बाहुबल से करते हैं परंतु संत समाज में फैली बुराईयों को अपने भ्रमण से दूर करते हैं। शास्त्र शास्त्रों में संतों का मिलना परम सुखकारी व कल्याणकारी कहा है। संतों के आगमन से अज्ञानता दूर होती है एवं सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है व समस्याओं का समाधान होता है। बुरे विचारों के आने से प्राणी के जीवन में समस्याएं व बुरी भावनाएं पैदा हो जाती हैं जो अपना व दूसरों का विनाश करती हैं पंडित पवन गौतम ने बताया कि एक बार व्यास जी चितित होकर संसार के विषय में विचार करें थे उसी समय उनका नारायण जी से मेल हो गया नारायण जी ने व्यास जी से उदासी का कारण जानकर उन्हें श्रीमद्भागवत की रचना करने की प्रेरणा दी जिससे समाज को सुख शांति और कल्याणकारी मार्ग की प्राप्ति हुई व्यास जी का यश चारों ओर फैल गया। पंडित जी ने कहा कि रावण ने मरीचि के पास जाकर उसे स्वर्ण मृग बनने को प्रेरित किया। रावण के कहने पर मरीचि ने सोने का हिरण बनकर श्री राम जी को धोखा दिया जिससे स्वयं मरीचि व रावण का भी विनाश हुआ। माता सीता व राम जी को कष्ट झेलने पड़े उन्होंने कहा कि हमें दुर्जनों की संगति से दूर रहकर संर्त के पास जाकर संतों का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। जिससे हमें सुख समृद्धि और शांति की प्राप्ति हो सके। कथा में सरिता सुन्दर काण्ड भजन मण्डली ने संकीर्तन भी किया। इससे पूर्व प्रात:: काल मनीष बांसल, कुणाल गर्गस्य, रोशन पुरी ने गणपति, नवग्रह व भागवत पुराण की पूजा की।
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