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    स्मार्ट सिटी के नाम पर खर्चे एक हजार करोड़, निगम के लिए एक भी स्मार्ट वर्क नहीं

    By JagranEdited By:
    Updated: Sun, 05 Jun 2022 12:39 AM (IST)

    नगर निगम अधिकारियों की गैर जिम्मेदाराना प्लानिग का नतीजा है कि पांच साल में एक हजार करोड़ खर्च करने के बावजूद शहर को स्मार्ट नहीं बना सके। इतना ही नहीं खुद निगम के लिए भी एक स्मार्ट वर्क को पूरा नहीं कर पाए हैं। बीते एक दशक से निगम अफसर यूनिक आइडेंटिफिकेशन (यूआइडी) प्लेट लगाने का काम पूरा नहीं कर पाए हैं।

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    स्मार्ट सिटी के नाम पर खर्चे एक हजार करोड़, निगम के लिए एक भी स्मार्ट वर्क नहीं

    वरिदर राणा, लुधियाना : नगर निगम अधिकारियों की गैर जिम्मेदाराना प्लानिग का नतीजा है कि पांच साल में एक हजार करोड़ खर्च करने के बावजूद शहर को स्मार्ट नहीं बना सके। इतना ही नहीं, खुद निगम के लिए भी एक स्मार्ट वर्क को पूरा नहीं कर पाए हैं। बीते एक दशक से निगम अफसर यूनिक आइडेंटिफिकेशन (यूआइडी) प्लेट लगाने का काम पूरा नहीं कर पाए हैं। अब प्लेट लगाने का काम स्मार्ट सिटी के तहत किया जाना है। इसके लिए 9.07 करोड़ खर्च किए जाने हैं। हालांकि, अभी तक यूआइडी प्लेट की फाइल अधर में लटक रही है। केवल यूआइडी ही नहीं, निगम अफसर स्मार्ट सिटी योजना के तहत किसी ब्रांच के काम को स्मार्ट नहीं कर पाए हैं। इसके मुकाबले नगर निगम बठिडा ने महज एक साल के अंदर यूआइडी नंबर लगाने का काम पूरा भी कर डाला है।

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    साल 2012 महानगर की प्रत्येक प्रापर्टी को यूआइडी नंबर देने की योजना तैयार हुई थी। सबसे पहले निगम ने जीआइसी सर्वे करवाने के लिए पंजाब रिमोट सेंसिग सेंटर (पीआरएससी) को यह काम सौंपा था। इसमें जीआइसी मैपिग के साथ संपत्ति का पूरा रिकार्ड भी दिया जाना था। यह मामला कछुआ चाल की तरह चलता रहा। आखिरकार साल 2014 में पीआरएससी की तरफ से दिए गए डाटा को डोर टू डोर सर्वे के लिए निगम ने दो कंपनियों को टेंडर के माध्यम से चुना। इसमें कंपनी की तरफ से संपत्ति के मालिक, कितने गज जमीन, कितनी मंजिल, सीवरेज-पानी कनेक्शन नंबर आदि का ब्यौरा जुटाया। इसमें बकायदा संपत्ति की फोटो भी खींची गई थी। साल 2016 में दोनों कंपनी ने यह काम पूरा कर निगम को सौंप दिया।

    यूआइडी प्लेट के लिए मारा मारी

    साल 2016 में संपत्तियों का पूरा सर्वे होने के बाद यूआइडी प्लेट लगाने पर माथा पच्ची शुरू हो गई। प्लेट के चयन को लेकर अधिकारियों के तर्ज चलते रहे। आखिरकार निगम अधिकारियों ने स्टील की बनी को एक प्लेट को सेलेक्ट कर लिया। इस प्लेट पर खर्च 100 रुपये रखा गया। महागनर में लगभग चार लाख इमारतों पर यह प्लेट लगाई जानी थी। अब सवाल खड़ा हो गया कि चार करोड़ रुपये राशि कौन खर्च करेगा। इसका काम एक कंपनी को दिया गया और उसे कहा गया कि वह संपत्ति पर प्लेट लगाने के बाद संपत्ति मालिक से 100 रुपये वसूल करेगी। जून 2017 में ब्लाक 26 से यह काम शुरू भी कर दिया गया, लेकिन ज्यादातर लोगों ने 100 रुपये देने से साफ मना कर दिया। आखिरकार कंपनी ने शहर में तीन हजार यूआइडी प्लेट लगाने के बाद काम ठप कर दिया। उस समय से यूआईडी प्लेट लगाने का काम ठप पड़ा है। अब स्मार्ट सिटी में इस योजना को डाला गया है, जोकि अभी तक अधर में है।

    यूआईई से निगम को होना था यह फायदा

    - प्रत्येक संपत्ति का ब्यौरा होना था आनलाइन

    - सीवरेज-पानी कनेक्शन वैध या अवैध होने का पता चलना था

    - रेजिडेंशियल, कामर्शियल या फिर औद्योगिक इमारत का पता चलता

    - संपत्ति मालिक के मोबाइल पर भेजे जा सकते थे बिल

    - डिफाल्टर पर कसा जाना था शिकंजा

    - निगम के खजाने में आना था पैसा :::::::

    यह बात सही है कि योजना काफी समय से लंबित पड़ी है। सोमवार को स्मार्ट सिटी योजना का रिव्यू होना है, इसमें इस योजना पर जरूर चर्चा होगी और इसे जल्द पूरा करने के लिए कहा जाएगा। जहां तक बठिडा में प्लेट की जगह सीधे संपत्ति की दीवार पर पेंट के माध्यम से यूआइडी नंबर लिखने की बात है, वहां के अधिकारियों से इस संबंध में बात की जाएगी।

    आदित्य डेचवाल, एडिशनल कमिश्नर निगम