जागरण संवाददाता, लुधियाना। किसी के चेहरे पर ख़ुशी लाना और खुशियां बांटना हर कोई नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि आज का इंसान अपनी व्यस्त ज़िंदगी में मशगूल है या फिर वो ख़ुशी बांटना नहीं चाहता, क्योंकि उसकी खुशियों का दायरा सिर्फ उसके अपनों तक है। हम अकेले भी किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकते हैं, लेकिन कुछ लोग मिलकर अगर किसी जरूरतमंद को उसकी जरूरत की चीज़े उपलब्ध करवा दें तो इससे बड़ा कर्म क्या हो सकता है। लोगों के पास जाकर उनकी परेशानियों को देखना, उनकी जरूरतों को समझना और फिर उनकी जरूरतों को पूरा करना अपने आप में एक मिशन है और ऐसी ही खुशियां बांटने का बीड़ा उठाया है पंजाब के लुधियाना शहर से "साया, मिशन हैपीनेस" एनजीओ ने।

'साया' एनजीओ की टीम लुधियाना की गली-गली में जाकर सर्वे करती है। सर्वे के दौरान उन लोगों से मिलती है जो दैनिक जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। 'साया -मिशन हैपीनेस' की 6 सदस्यीय कमेटी के अतिरिक्त अन्य 14 सदस्य अपनी व्यस्त ज़िंदगी के कुछ लम्हें निकाल कर उन लोगों पर खर्च करती है और अपनी आमदनी से ही उनकी जरूरतों के अनुसार चीज़े मुहैया करवाती है। केवल 6 महीने पहले शुरू किए गए इस एनजीओ ने अब तक सैंकड़ों लोगों की जरूरतों को पूरा किया और उनके चेहरे पर खुशियां लाकर उनके इन यादगार पलों में शामिल हुए।

"साया, मिशन हैपीनेस" के अध्यक्ष अभिषेक टक्कर ने बताया कि एक महीने में 2 इवेंट किए जाते हैं। हर इवेंट 15 दिन बाद किया जाता है। अब तक कुल 12 इवेंट कर चुके हैं। उनका कहना है कि टीम साया का मकसद आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों की जरूरतों को हर संभव पूरा करना है। इसके लिए उनके प्रयास लगातार जारी हैं। कोई भी इवेंट करने से पहले बस्ती, मोहल्ले या फिर नुक्क्ड़ का सर्वे करने के लिए टीम के साथ वे खुद जाते हैं। उन लोगों से मिलते है उन्हें समझते है और उनकी जरूरतों के बारे बात करते हैं। जून महीने में एक सर्वे के दौरान उन्हें पता चला कि लुधियाना की एक स्लम बस्ती में कुछ बच्चे तपती गर्मी में नंगे पांव घूमते हैं। इसके बाद उनकी पूरी टीम ने वहां जाकर बच्चों को चप्पलें बांटी। इसके अलावा वहां रहने वाले अन्य ज़रूरतमंदों को आटा, दाल, चावल, बिस्किट आदि चीज़े वितरित की। इसके अतिरिक्त एक इवेंट में दिव्यांग स्कूल में जाकर बच्चों को कुर्सियां बांटी। "साया" एनजीओ की ख़ास बात यह है कि एक इवेंट में करीब 10 से 12 हज़ार का खर्च करती है।

'साया' एनजीओ के 20 सदस्य मिलकर खर्चा उठाते है, लेकिन कोई भी चीज़ लेने के लिए उसकी गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं किया जाता। हर चीज़ को जांच-परख कर लिया जाता है। इसके अतिरिक्त एनजीओ के मानवतापूर्ण कार्यों से प्रेरित होकर कई अन्य लोग भी जुड़ रहे है और अपनी सामर्थ्य अनुसार अभिदान करने में हिस्सा ले रहे हैं। अभिषेक ने बताया कि जन्माष्टमी के सप्ताह उनके एनजीओ ने स्लम बस्ती के 80 बच्चों का सामूहिक जन्मदिन मनाया। इस मौके पर केक काटा गया और बच्चों को गिफ्ट्स, टोपियां, टॉफियां इत्यादि बांटी गईं। उन्होंने बताया कि अगला मिशन हैप्पीनेस वे ओल्ड एज होम में करेंगे। इसके लिए सर्वे किया जा रहा है. सर्वे के बाद जिन चीज़ों की वहां कमी होगी उन्हें एनजीओ द्वारा उपलब्ध करवाया जाएगा।

'साया' एनजीओ सोशल मीडिया जैसे व्हॉट्सएप, फेसबुक आदि पर अपने आने वाले इवेंट का ब्यौरा देती है। तो यह कहना बिल्कुल सार्थक है कि "साया, मिशन हैपीनेस" एनजीओ खुशियों को जरूरतमंदों की झोली में डाल रही है। उनका कहना है कि साया की मुहिम से कमजोर वर्ग के लोगों में उम्मीद की किरण जाग रही है। उधर संस्था के सदस्यन भी अपनी क्षमता के अनुसार लोगों की मदद को तैयार रहते हैं।

By Krishan Kumar