दीन-दुखियों की सेवा करने वाला श्रेष्ठ : डा. मुलख राज जैन
श्रमण भगवान महावीर ने अपने दीर्घ अनुभवों से जो संदेश मानव मात्र के लिए प्रेषित किए है वो निश्चय ही अनुकरणीय है। इसका गहन अध्ययन करें। उक्त पंक्तियां धर्म गुरु से अलंकृत व साहित्य रत्न डा. मुलख राज जैन ने व्यक्त करते हुए कहा कि हजारों प्राणियों को युद्ध में जीतने वाले की अपेक्षा अपने मन को जीतने वाला सच्ची विजय प्राप्त करता है।

संस, लुधियाना : श्रमण भगवान महावीर ने अपने दीर्घ अनुभवों से जो संदेश मानव मात्र के लिए प्रेषित किए है वो निश्चय ही अनुकरणीय है। इसका गहन अध्ययन करें। उक्त पंक्तियां धर्म गुरु से अलंकृत व साहित्य रत्न डा. मुलख राज जैन ने व्यक्त करते हुए कहा कि हजारों प्राणियों को युद्ध में जीतने वाले की अपेक्षा अपने मन को जीतने वाला सच्ची विजय प्राप्त करता है। अपनी आत्मा ही वैतरणी नहीं है। अपनी आत्मा ही कूडशालमली वृक्ष दुख देने वाला है। अपनी आत्मा ही कामधेनु है और अपनी आत्मा ही नंदन वन है। जो शिष्य अपने गुरु के सानिध्य में क्रोध से अथवा छल से विद्या सीखता है। वह विद्या उसी शिष्य के विनाश का वैसे ही कारण बन जाती है। जैसे बरसों के झुरमुट को स्वयं की आग लग जाती है। जो दीन दुखियों की सेवा करता है, वहीं श्रेष्ठ है। वहीं भगवान का सानिध्य प्राप्त कर सकता है। ह्दय से ही गई। सेवा आत्म कल्याण का मार्ग है। जो तुम कहते हो या जानते हो वहीं सत्य है। ऐसा कदाग्रह मत करो। दूसरों की बात में भी सत्यता हो सकती है। उनकी बात को भी स्वीकार करो यहीं अनेकांतवाद है। प्राणी को संसार में चार बातें मिलनी दुर्लभ है। मानवता, ज्ञान, श्रद्धा और आचरण। इनका अनूुसरण हम सबको करना चाहिए।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।