भारतीय संस्कृति की विविधता ही देश की ताकत, साहित्यकारों ने कहा- आपसी प्रेम और संवाद से मजबूत होगा समाज
दैनिक जागरण की विचार गोष्ठी में साहित्यकारों ने भारतीय संस्कृति, भाषा, हिंदुत्व, सांप्रदायिकता, राजनीति और भ्रष्टाचार पर विचार रखे। वक्ताओं ने संवाद, आत्ममंथन और सांस्कृतिक मूल्यों पर जोर दिया।

दैनिक जागरण की ओर से सामाजिक और राष्ट्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार रखते हुए साहित्यकार और लेखक।
HighLights
दैनिक जागरण ने लुधियाना में भारतीय संस्कृति पर विचार गोष्ठी आयोजित की।
साहित्यकारों ने राजनीति, भ्रष्टाचार, धर्म और हिंदुत्व पर विचार साझा किए।
वक्ताओं ने आपसी प्रेम और संवाद से समाज मजबूत करने पर जोर दिया।
जागरण संवाददाता, लुधियाना। दैनिक जागरण की ओर से सामाजिक और राष्ट्र से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विचार गोष्ठी वीरवार पंजाबी भवन में आयोजित की गई। शहर के विभिन्न साहित्यकारों एवं लेखकों ने विचार गोष्ठी में हिस्सा लेते हुए अपने विचार रखे। लेखकों ने भारतीय संस्कृत, हिंदुत्व, धर्म और सांप्रदायिकता, आज की राजनीति व भ्रष्टाचार विषय पर अपनी बात रखी।
दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक स्व. नरेंद्र मोहन की जंयती पर देशभर में चल रही विचार गोष्ठियों का समापन दिल्ली में जागरण साहित्य सृजन सम्मान कार्यक्रम के साथ होगा, जिसमें 11 लाख रुपये की सम्मान राशि दी जाएगी।
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भारतीय संस्कृति विविधता वाली संस्कृति में से एक
गोष्ठी की शुरूआत डाॅ. गुरचरण कोचर ने भारतीय संस्कृति विषय पर बोलते हुए की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति पूरी दुनिया में विविधता वाली संस्कृति में से एक है। इसमें अनेकता में एकता है। हर किसी के त्योहार, खान-पान, लोकगीत, लोक नाटक विभिन्न है। हमारा सभ्याचार पीढि़यां दर पीढ़िया संयुक्त परिवार का चल रहा है लेकिन अब इसमें बदलाव आ गया है और यह एकल की तरफ झुक रहा है। इतनी विभिन्न होने के बाद भी भारत एक है। वर्तमान में भारतीय संस्कृति को जड़ों से जोड़ने की जरूरत है ताकि आपसी प्यार बना रहे।
सभ्यता और संस्कृति एक सिक्के के दो पहलू
सागर सियालकोटी ने कहा कि सभ्यता और संस्कृति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भारतीय सभ्यता एक पुरातन सभ्यता है। समय समय पर संस्कृति और समाज ढांचे में बदलाव होते रहते हैं। उनका मानना है यदि किस देश की संस्कृति को समाप्त करना हो, तो उसकी भाषाई पहचान को समाप्त कर दो। अंग्रेजों ने भारत पर लगभग दो सो साल तक राज किया।
ब्रिटिश पार्लियामेंट में लार्ड मैकाले ने कहा था कि हिंदोस्तान पर राज करना कोई मुश्किल काम नहीं है,बस उनकी जबान छीन लो फिर ब्रिटिश हुक़ूमत ने पूरे हिंदुस्तान में कानवेंट स्कूलों का एक जाल बिछा दिया और हिंदोस्तानियों को क्लर्क क्लास दी जो आज भी भारत वर्ष में पूरी तरह छाई हुई है।
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राजनीति का मतलब राज नहीं
करमजीत सिंह ग्रेवाल ने राजनीति और भ्रष्टाचार विषय पर बोलते कहा कि राजनीति का मतलब राज नहीं पर राजनीतिक क्षेत्र में कौन लेकर आता है तो हम ही लाते हैंं। हमारी मानसिकता ही ऐसी बनी है कि राजनीति में आ रहे हैं तो इनका काम पैसा खाना ही है। भ्रष्टाचार केवल नेता ही नही करता, हम करवाते हैं। हम सभी को अपने अंदर झांकने की जरूरत है, हमें संवाद करने की आवश्यकता है।
हर राज्य की अपनी संस्कृति
संस्कृति विषय पर विचार रखते सुरिंदर कौर ने कहा कि हर राज्य की अपनी संस्कृति, अपनी पहचान है। संस्कृति सहनशीलता, प्यार करना सिखाती है। आज के जो इससे दूर हो रहे है, उन्हें भी आपस में मिल-जुल कर रहने का काम सिखाती है।
सहजप्रीत सिंह मांगट ने राजनीति और भ्रष्टाचार विषय पर विचार रखते कहा कि हमें अपने आप में सच्चे होना चाहिए। राजनीति में भ्रष्टाचार की बातें तो सुनते आ रहे हैं लेकिन तरीके अलग है पर सिस्टम सभी एक है। हम अपने आप को आसानी में लेते हैं जबकि राजनीति और भ्रष्टाचार आपस में मिले हुए हैं।
हर कोई बुद्धिजीव कहलाकर होता है खुश
धर्म और सांप्रदायिकता विषय पर विचार रखते जगविंदर जोधां ने कहा कि हर कोई बुद्धिजीव कहलाकर खुश होता है। जब कोई भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अमीर होने की बात करता है तो हैरानी होती है। आजादी के करीब 80 साल बाद भी देश में 1300 के करीब दंगे हो चुके हैं। अगर यह कहा जाए कि लोग सद्भावना से रहते हैं तो यह चीजें क्यों होती हैं? प्रकृति और कल्चर इक्ट्ठे विकसित हुए पर विचार उसके रुपक बन गए हैं।
संस्कृति को कम शब्दों में समेटना गलत
भारतीय संस्कृति विषय पर विचार रखते हुए जगतार सिंह हिस्सोवाल ने कहा कि भारतीय संस्कृति को कम शब्दों में समेटना बहुत कठिन है। पहले अपने आप को जानो, फिर संसार को जानने की कोशिश करें। अपना मूल्यांकन खुद करें। विभिन्न विचारों का आदर करना सीखें।
गुलजार सिंह पंधेर ने हिंदुुत्व विषय पर विचार रखते कहा कि आज के समय में हम सभी ग्लोबल हैं। धर्म आर्गेनाइज होता है। ईमानदार बनने का हर कोई यत्न करता है लेकिन समाज ईमानदार होने नहीं देता।
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