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    अंग्रेजों की नौकरी छोड़ आजादी की जंग में कूदे थे लुधियाना के गदरी बाबा भान सिंह, ढाई फीट के पिंजरे में काटी थी सजा

    By Vipin KumarEdited By:
    Updated: Sun, 05 Jun 2022 11:07 AM (IST)

    लुधियाना के गांव सुनेत के रहने वाले गदरी बाबा भान सिंह ने आजादी की जंग के लिए अंग्रेजी शासन के दौरान पुलिस की घुड़सवार सेना में नौकरी करते छाेड़ दी थी। उन्हें ढाई फीट ऊंचे ढाई फीट चौड़े जंगले में बंद कर दिया था।

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    गांव सुनेत के बाबा भान सिंह को अंग्रेजों ने इस तरह जेल में रखा था। जागरण

    दिलबाग दानिश, लुधियाना। शहर के गांव सुनेत में एक ऐसी जगह है जो अंग्रेजों की क्रूरता का व्याख्यान करती है। अंग्रेज हकूमत ने अंग्रेजों को उनकी भाषा में जवाब देने पर लोगों को काला पानी की सजा के दौरान ढाई फीट ऊंचे, ढाई फीट चौड़े जंगले में बंद कर दिया जाता था और इसका माडल यहां पर बलिदानी भान सिंह की याद में बनाई गई स्मारक में बनाया गया है।

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    गांव सुनेत से गदरी बाबा भान सिंह हुए हैं। वह अंग्रेजों के शासन के दौरान पुलिस की घुड़सवार सेना में नौकरी करते थे और गुलामी की जंजीरें तोड़ने के लिए नौकरी छोड़ अमेरिका चले गए थे। वहां जाकर उनका संपर्क करतार सिंह सराभा और अन्य गदरी योद्धाओं से हुआ तो वह अमेरिका में सोहन सिंह भकना की अगुआई वाली गदर पार्टी में शामिल हो गए।

    भारत में गदर मचाने के लिए जब 13 सितंबर 1915 को कलकत्ता अब कोलकाता पहुंचे तो दूसरे गदरियों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया था। गदरी बाबा भान सिंह की याद में यादगार सुनेत गांव में बनाई गई है, इसमें अंडमान निकोबार के सुर्कलर जेल का माडल बनाया गया है। यहां वैसा ही पिंजरा बना है और उसमें बाबा को बैठे दिखाया गया है। इसके अलावा यहां लाइब्रेरी है और इसका संचालन करने के लिए शहीद बाबा भान सिंह मेमोरियल ट्रस्ट बनाया गया है। ट्रस्ट ही कामकाज देखता है।

    13 सितंबर 1915 को गदर आंदोलन पर हुई थी काले पानी की सजा

    अंग्रेजी हकूमत ने 24 गदरियों को फांसी तो 27 को काले पानी की सजा दी थी। काले पानी की सजा पाने वालों में बाबा भाना सिंह भी शामिल थे। वह करीब तीन साल तक अंडमान निकोबार के सकरुलर जेल में बंद रहे थे। मगर यहां भी उनका अंग्रेजों के खिलाफ झंडा बुलंद रहा। गोरे सैनिक द्वारा एक बार उन्हें गाली दी तो उन्होंने भी उसे गाली दे दी थी। इसके बाद उन्हें डंडा बेड़ी कोठड़ी में बंद कर दिया गया और बेहद कम खाना दिया जाता था। वह दो मार्च 1918 को बलिदान हुए थे।