फरीदकोट, देवानंद शर्मा ।  सरकार बार-बार नशे से बचने के लिए युवाओं को खेलों में खेलने के लिए प्रोत्साहित करती है ताकि वे अपने भविष्य को सुनहरा बना सकें। जिसके लिए कई बार अच्छे खिलाड़ियों को विभिन्न विभागों द्वारा नौकरी की पेशकश की जाती है। लेकिन बहुत कम भाग्यशाली होते हैं जिन्हें एक अच्छी नौकरी मिल जाती है। सरकारें खिलाड़ियों के लिए नौकरियां भी आरक्षित करती हैं, लेकिन कई बदनसीब ऐसे भी हैं, जो अपना पूरा जीवन खेल को समर्पित कर देते हैं, फिर भी वे कोई उनकी बांह नहीं पकड़ता। जसके चलते वे गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाते हैं।

हॉकी कोच ने पहचाना हुनर 

ऐसा ही एक खिलाड़ी है फरीदकोट का जो 9 बार राष्ट्रीय टीम के लिए खेलने और दो बार भारतीय हॉकी टीम में चुने जाने के बावजूद किसी कंपनी या सरकार द्वारा उसे नौकरी नहीं दी गई। यहीं कारण है कि वह मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालने के लिए मजबूर है।हम बात कर रहे हैं यूपी मूल और पंजाब में जन्मे परमजीत सिंह की। जिनके पिता फरीदकोट के सरकारी बरजिंद्रा कॉलेज में माली के रूप में काम करते थे और परमजीत जिन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा फरीदकोट के सरकारी स्कूल में की और शिक्षा के साथ-साथ उन्हें खेल से भी प्यार था इसलिए खिलाड़ियों को खेलते देखकर जिस मैदान पर उनके पिता रहते थे, वह उस मैदान से जुड़ गए और वहां खेलने लगे। जिस पर हॉकी कोच बलजिंदर सिंह की नजर पड़ी और उन्होंने उनके कौशल को पहचाना और उसके हाथों में हाकी पकड़ा दी।

पांच बार जीता पदक 

धीरे-धीरे परमजीत एक बढ़िया फुल बैक पोजिशन का खिलाड़ी बन गया। इस तरह उसने टीम के लिए खेलना शुरू किया और अपने अच्छे प्रदर्शन के कारण उन्हें NIS पटियाला में एक सीट मिली जहाँ उन्होंने 6 वीं कक्षा से 12 तक की पढ़ाई की और साथ ही जूनियर और सीनियर राष्ट्रीय खेलों के लिए 9 बार उनका चयन किया और 5 बार पदक जीता। इसके बाद उन्होंने बिजली बोर्ड और पंजाब पुलिस द्वारा कई प्रतियोगिताओं में अपना दम दिखाया, लेकिन दुर्भाग्य से दोनों विभागों द्वारा अनुबंध के तहत खेलने के बाद उन्हें नियमित नहीं किया गया।इस बीच 2009 में बांग्लादेश में होने वाले जूनियर एशियाा कप के लिए जाने वाली इंडिया टीम में उसका रिसलेक्शन हुआ परन्तु किसी कारण यह टूर्नामेंट रद्द हो गया। जिसके कारण वह एशिया कप नहीं खेल पाया।

हाथ टूटने के बाद हुआ करीर बेकार 

खेलों के दौरान उनका हाथ टूट गया, जिसके कारण वे दो साल तक खेल से दूर रहे, जिसके कारण उनका भविष्य बर्बाद हो गया। जिसके बाद न तो सरकार ने उसका साथ दिया और न ही किसी कंपनी या विभाग ने उसे नौकरी दी। जिसके बाद प्रतिभाशाली खिलाड़ी का हौसला टूट गया और एक समय ऐसा भी आया जब उसने ड्रग्स लेना शुरू कर दिया। लेकिन धीरे-धीरे अपना घर चलाने के लिए उसने कड़ी मेहनत शुरू कर दी। वर्तमान समय में मेडलों और प्रमाणपत्रों के ढेर के बावजूद परमजीत बाजारों में कंधे पर बोरी लादे हुए अपना और अपने बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए एक छोटे से किराए के मकान में रह रहे हैं।

नौकरी के लिए सरकार से लगाईं मदद की गुहार 

परमजीत द्वारा सरकार से बार-बार गुहार लगाई गई कि वे पिछड़े वर्ग के हैं और बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई भी की है। इसलिए वह नौकरी का हकदार है। सरकार उसकी मदद करे, भले ही उसे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में नौकरी दी जाए। वह अभी भी अपनी प्रतिभा दिखा सकता है और साथ ही वह अपना और अपने परिवार के सपनों को पूरा कर सकता है। इसके साथ ही वह अपने बेटे को भारतीय टीम में खेलते हुए देखने को सपने को पूरा करने का प्रयाय कर रहा है। बस उसे एक सहारे की आवश्यकता है।

Edited By: Nidhi Vinodiya

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