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    अन्नदाता होने का मतलब

    By JagranEdited By:
    Updated: Thu, 19 Sep 2019 06:31 AM (IST)

    किसान को अन्नदाता कहते हैं। उसके बिना हमें खाना नसीब नहीं होगा।

    अन्नदाता होने का मतलब

    जागरण संवाददाता, चंडीगढ़ : किसान को अन्नदाता कहते हैं। उसके बिना हमें खाना नसीब नहीं होगा। इस आधार पर उसको सबसे ज्यादा इज्जत और अमीर होना चाहिए। मगर इससे उल्ट ही उनके साथ होता है। नाटक समां वाली डांग में इसी दर्द को खूबसूरती से पेश किया गया है। जिसका मंचन बुधवार को पंजाब कला भवन-16 में हुआ। स्वर्गीय गुरुशरण सिंह की याद में आयोजित थिएटर फेस्टिवल के आखिरी दिन इस नाटक का मंचन हुआ। नाटक का निर्देशन और लेखन डॉ. साहिब सिंह ने किया। नाटक एक किसान के इर्द-गिर्द घूमता है। जो सरकार से निराश होकर शहर में आकर धरना देता है। शहर की चकाचौंध देख वह हैरान हो जाता है। वो अपने गांव में भी किसानों को ऐसे ही रहन सहन की बात उठाता है, जहां किसानों को बेहतर जीवन और बेहतर उपचार मिले। वह अपने सरपंच से इससे जुड़ी बात करता है। शहर में लोगों द्वारा किसानों को अजीब नजरों से देखना, जैसी चीजों पर भी नाटक में कटाक्ष किया। नाटक में सरकार पर भी कटाक्ष किया गया, जहां किसान जीजान लगाकर अपनी खेती करता है, मगर उसे कभी उसके अनुरूप मेहताना नहीं मिलता। नाटक में साहिब सिंह ने किरदार को बेहतरीन अंदाज से मंच पर पेश किया। किसानों को करीब से देखा तो लिखा नाटक

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    डॉ. साहिब सिंह ने नाटक उन्होंने किसानों को देखते हुए ही लिखा। अकसर किसानों को चंडीगढ़ में हड़ताल पर देखता था तो ये नाटक लिखने का विचार आया। मेरे अनुसार एक कलाकार ही इनका दर्द मंच पर उतार सकता है। समय-समय पर किसानों पर नाटक लिखे गए हैं। मगर हमें ज्यादा से ज्यादा इसे मंचित करने की जरूरत है। गुरुशरण सिंह ने आम लोगों की आवाज अपने नाटकों में उठाई थी। मैंने भी उनसे ही रंगमंच सीखा है, ऐसे में वह आवाज अपने नाटकों में भी उठाउंगा।