हावड़ा में नहीं किताबों में मिलेगी सरस्वती
सुनील शर्मा, हावड़ा :
कभी हावड़ा की शान रही सरस्वती नदी अब इतिहास बन चुकी है। आज हम इसे नाले में बदलते देख रहे हैं। कल की पीढ़ी इसके बारे में सिर्फ किताबों में पढ़ेगी। पूरे देश से सरस्वती के गायब हो जाने की यह दुखद बानगी है।
1998 में सरस्वती बचाओ अभियान के तहत हुए लंबे आंदोलन के बाद सरकार ने नदी मार्ग की कटाई शुरू की। हालांकि इससे कोई फायदा नहीं हुआ। करीब 70 साल पहले यह नदी सिंचाई एवं यातायात का मुख्य साधन थी। इसके पानी से जहां खेतों में फसलें लहलहाती थीं, वहीं हुगली से हावड़ा के ग्रामीण इलाकों में आवाजाही के लिए नदी मार्ग ज्यादा सुगम था। अब ऐसा कुछ नहीं है। नदी का पानी गायब हो चुका है। डोमजुड़ जैसे कुछ जगहों पर पानी दिखता भी है, तो सिर्फ नाम मात्र का।
झारखंड के रास्ते हुगली होते हावड़ा तक आने वाली सरस्वती सांकराइल में गंगा में मिलती है। हुगली के त्रिवेणी से सांकराइल तक 77 किमी लंबे बहाव क्षेत्र में पानी नहीं दिखता। इसी तरह सिंगुर के समीप नसीबपुर में स्थिति काफी खराब है। डोमजुड़ में 57 नंबर बस स्टैंड से बलुहाटी तक लगभग 4 किमी तक नदी पूरी तरह सूख चुकी है। सरस्वती बचाओ अभियान से जुड़े रहे पापी ठाकुर व गोपाल पाल का मानना है कि इसके मार्ग की सटीक कटाई करने से नदी पुनर्जीवित की जा सकती है। इन लोगों ने 2006 में हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर कर नदी को बचाने की अपील की थी। दिसंबर 2006 में हाइकोर्ट ने सरकार को नदी को दोनों किनारे से अतिक्रमण हटाने म मिंट्टी कटाई का निर्देश दिया था। इसके बाद हुगली व हावड़ा जिला प्रशासन ने जनवरी 2007 में अतिक्रमण हटाना शुरू कर दिया। मिंट्टी कटाई के लिए करीब 32 करोड़ रुपए भी आवंटित हुए, लेकिन सिर्फ 12 किमी ही मिंट्टी कटाई हो सकी। नतीजतन, यह नदी सूख रही है।
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