पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग से यौन अपराध मामले में आरोपी बरी, मारपीट में सजा बरकरार
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बठिंडा के एक मामले में नाबालिग से यौन अपराध के आरोपों में आरोपी को बरी ...और पढ़ें

ये AI जनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर है।
HighLights
हाईकोर्ट ने नाबालिग यौन अपराध में आरोपी को बरी किया।
मारपीट के आरोप में एक साल की सजा बरकरार रखी गई।
अभियोजन पक्ष संदेह से परे आरोप साबित नहीं कर सका।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने नाबालिग से कथित यौन अपराध के मामले में आरोपित को बरी करने के निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया। अदालत ने कहा कि गंभीर आरोप होना अपने आप में दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को आरोप संदेह से परे साबित करना होता है। हालांकि, मारपीट के मामले में आरोपी को सुनाई गई एक वर्ष की सजा बरकरार रखी गई।
जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस रविंदर मलिक की पीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला बठिंडा जिले के मौड़ थाने में 30 जुलाई 2016 को दर्ज प्राथमिकी से जुड़ा था। शिकायतकर्ता लाल सिंह ने आरोप लगाया था कि उसके करीब 13 वर्षीय पोते के साथ 27 जुलाई 2016 को यौन अपराध किया गया। बाद में आरोपित से सामना होने पर शिकायतकर्ता के साथ मारपीट हुई थी।
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2019 में हुई थी कठोर कारावास
निचली अदालत ने 21 फरवरी 2019 को आरोपित को भारतीय दंड संहिता की धारा 325 के तहत दोषी ठहराते हुए एक वर्ष के कठोर कारावास और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। यौन अपराध के आरोपों में उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया था। शिकायतकर्ता ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने चिकित्सकीय साक्ष्य को अहम माना। जांच करने वाले चिकित्सक को यौन पार्ट में लालिमा, खरोंच या असामान्य सूजन नहीं मिली थी। उसने यौन हमले या अप्राकृतिक यौन संबंध के संकेत होने से भी इन्कार किया था। अदालत ने कहा कि घटना के बाद चिकित्सकीय जांच और पुलिस कार्रवाई के क्रम पर अभियोजन पक्ष संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका।
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साक्ष्यों की कमी का मिला फायदा
रासायनिक परीक्षक की रिपोर्ट में नमूने में शुक्राणु पाए गए, लेकिन डीएनए जांच नहीं होने से जैविक सामग्री को आरोपी से जोड़ना संभव नहीं हुआ। नाबालिग के अंतर्वस्त्र भी जांच के लिए जब्त नहीं किए गए थे। अदालत ने कहा कि हर यौन अपराध में डीएनए साक्ष्य अनिवार्य नहीं है, लेकिन इस मामले की रिपोर्ट आरोपी से सीधा संबंध स्थापित नहीं कर सकी।
स्कूल के हाजिरी रजिस्टर में 27 और 28 जुलाई को नाबालिग की उपस्थिति दर्ज थी। यह रिकॉर्ड घटना के दिन स्कूल बंद होने और दोपहर में क्रिकेट खेलने संबंधी बयान से मेल नहीं खाता था। इन परिस्थितियों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने माना कि अभियोजन आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
