पंजाब के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप, हाई कोर्ट ने CBI को सौंपी जांच; दो महीने में पेश करनी होगी रिपोर्ट
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने राज्य में तबादलों, नीतिगत फैसलों और सरकारी कामकाज में कथित भ्रष्टाचार की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है।

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट (फाइल फोटो)
HighLights
हाई कोर्ट ने पंजाब में भ्रष्टाचार की जांच CBI को सौंपी
CBI को तत्काल FIR दर्ज कर दो माह में रिपोर्ट देनी होगी
पंजाब पुलिस की जांच पर कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब में तबादलों, नीतिगत फैसलों, निविदाओं और सरकारी कामकाज में कथित भ्रष्टाचार से जुड़े मामले की जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो करेगा।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने सोमवार को जनहित याचिका का निपटारा करते हुए अपने 66 पेज के आदेश में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने जांच के परिणाम की रिपोर्ट दो माह में पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई सात दिसंबर को होगी। यह जनहित याचिका निखिल सराफ ने दायर की थी।
पंजाब के अधिकारियों पर उठे सवाल
इसमें पंजाब के वरिष्ठ अधिकारियों पर तबादलों के बदले नकदी लेने, अनुकूल नीतियां बनवाने, निविदाओं में कथित लेनदेन तथा अन्य गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए थे।
इसमें पंजाब के मुख्यमंत्री के ओएसडी और उनके सहयोगियों नितिन गोहल तथा वीर देविंदर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की गई थी।
कोर्ट में ईडी की जांच में सरकारी अधिकारियों की पोस्टिंग प्रभावित करने, गोपनीय दस्तावेजों तक पहुंच, सरकारी मंजूरियों और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं में कथित हस्तक्षेप से संबंधित सामग्री सामने आने का दावा किया गया है।
प्रवर्तन निदेशालय ने 30 जुलाई को धन शोधन निवारण अधिनियम की धारा 66(2) के तहत पंजाब के पुलिस महानिदेशक को पत्र भेजा था। इसमें जांच के दौरान मिले दस्तावेज, संदेश और अन्य सामग्री के आधार पर कथित तौर पर सरकारी अधिकारियों को प्रभावित करने, तबादलों और नियुक्तियों में दखल, नीतिगत फैसलों तथा सरकारी स्वीकृतियों में हस्तक्षेप और कथित आर्थिक लाभ से जुड़े आरोपों का उल्लेख था।
दो महीने तक दर्ज नहीं की एफआईआर
अदालत ने पाया कि सूचना मिलने के बावजूद लगभग दो माह तक प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई। पंजाब पुलिस ने पहले सामग्री की जांच, संबंधित लोगों को नोटिस और विभिन्न विभागों से जानकारी लेने की प्रक्रिया शुरू की।
बाद में प्रवर्तन निदेशालय से अधिक स्पष्ट और पठनीय दस्तावेज मांगे गए। अदालत ने इस प्रक्रिया को सवालों के घेरे में लेते हुए कहा कि यदि सामग्री शुरू से ही अस्पष्ट थी तो लगभग एक माह तक उस पर विचार करने और संबंधित लोगों को नोटिस देने के बाद स्पष्ट दस्तावेज मांगना असामान्य है।
अदालत ने पंजाब ब्यूरो आफ इन्वेस्टिगेशन की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि राज्य इस मामले में राज्य का जो रवैया रहा है उसको देखते हुए निष्पक्ष जांच की संभावना नहीं है।
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मामला संगीन और आरोप गंभीर है इसलिए इसकी जांच सीबीआई को देना जरूरी है। हाई कोर्ट ने मामले की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ईडी की सूचना के बाद पंजाब पुलिस की कार्रवाई ऐसी रही, जिसमें “सारी यात्रा हुई, लेकिन मंजिल तक नहीं पहुंचा गया।”
अदालत ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय की ओर से उपलब्ध कराई गई सामग्री में कई व्हाट्सएप संदेश और अन्य दस्तावेज शामिल हैं, जिनसे प्रथम दृष्टया उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों से जुड़े संज्ञेय अपराध की जानकारी सामने आती है।
हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपों की वास्तविकता का अंतिम निर्णय जांच और मुकदमे के दौरान ही होगा। पंजाब पुलिस के रवैये से संतुष्ट नहीं होने पर अदालत ने जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दी।
ब्यूरो को तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर जांच आगे बढ़ाने तथा दो माह में परिणाम की रिपोर्ट हाई कोर्ट में दाखिल करने का निर्देश दिया गया है। पंजाब सरकार और पंजाब पुलिस को जांच में पूरा सहयोग करने को कहा गया है।
ईडी की दलील
ईडी ने 21 व्हाट्सऐप बातचीत का हवाला दिया, जिनमें तबादलों और नियुक्तियों से संबंधित संवाद थे। इसके अलावा 11 बातचीत में नीतियां बनाने, विभागीय नियमों में बदलाव, प्रशासनिक मंजूरियों, निविदा शर्तों, लाइसेंस और अन्य सरकारी फैसलों से जुड़े मामलों का उल्लेख था।
छह बातचीत जमीन सौदों, भूमि उपयोग परिवर्तन और सरकारी मंजूरियों से संबंधित बताई गईं, जबकि अन्य बातचीत में गोपनीय सरकारी सूचनाओं के कथित रिसाव और भुगतान व कमीशन से जुड़े आरोपों का उल्लेख था। ईडी ने नितिन गोहल से 20.98 लाख रुपये नकद बरामद होने की भी जानकारी दी।
अदालत ने याचिकाकर्ता के फार्म हाउस निर्माण के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने के तुरंत बाद हुई तोड़फोड़ की कार्रवाई को भी संदेह की दृष्टि से देखा।
अदालत ने कहा कि वर्ष 2024 में जारी कारण बताओ नोटिस के बाद लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन जनहित याचिका दायर होने के तुरंत बाद तोड़फोड़ आदेश जारी होना प्रथम दृष्टया अस्वाभाविक प्रतीत होता है। हाई कोर्ट ने कहा कि मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच जरूरी है।
