1997 भर्ती केस में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका, क्या 30 साल पुरानी नियुक्तियां रहेंगी बरकरार?
हाई कोर्ट ने करीब 30 साल पुराने भर्ती विवाद को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय बाद ...और पढ़ें

ये AI जनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर है।
HighLights
हाई कोर्ट ने 30 साल पुराने भर्ती विवाद की याचिकाएं खारिज कीं।
याचिकाकर्ता चयन में मनमानी, पक्षपात के आरोप साबित नहीं कर सके।
30 साल बाद नियुक्तियां दोबारा खोलना उचित नहीं माना गया।
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब तीन दशक पुराने भर्ती विवाद का निपटारा करते हुए स्वीपर-कम-चौकीदार, स्वीपर और चौकीदार समेत अन्य पदों पर हुई नियुक्तियों को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं को निष्प्रभावी करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता चयन प्रक्रिया में मनमानी, पक्षपात या भाई-भतीजावाद के आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री पेश नहीं कर सके।
वहीं, चयनित कर्मचारी लगभग 30 वर्षों तक सेवा कर चुके हैं, इसलिए इतने लंबे अंतराल के बाद उनकी नियुक्तियों को दोबारा खोलना उचित नहीं होगा। जस्टिस संदीप मौदगिल ने बूटा सिंह व अन्य की याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ताओं ने संबंधित चयन एवं नियुक्तियों को रद करने और उन्हें नियुक्ति देने की मांग की थी।
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3000 उम्मीदवारों के इंटरव्यू पर उठाया था सवाल
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चयन समिति ने मनमाने तरीके से उम्मीदवारों का चयन किया। उनका दावा था कि करीब 3000 उम्मीदवारों का महज तीन दिन में इंटरव्यू लिया गया, जिससे वास्तविक मूल्यांकन संभव नहीं था। कुछ चयनित उम्मीदवारों की उम्र और पात्रता पर भी सवाल उठाए गए थे। एक याचिकाकर्ता ने करीब 900 दिन का अनुभव होने के बावजूद उससे कम योग्य उम्मीदवारों के चयन का दावा किया था।
राज्य सरकार ने इन आरोपों से इनकार करते हुए बताया कि साक्षात्कार में 3000 नहीं, बल्कि 1442 उम्मीदवार शामिल हुए थे। अलग-अलग पदों और श्रेणियों के लिए चयन समिति के अलग-अलग सदस्यों ने विभिन्न तारीखों पर उम्मीदवारों का मूल्यांकन किया। प्रदर्शन, उपयुक्तता और सामान्य योग्यता के आधार पर अंक दिए गए और अंतिम चयन सूची को समिति के सभी सदस्यों ने मंजूरी दी थी।
महज संदेह से चयन प्रक्रिया नहीं हो सकती रद
हाई कोर्ट ने कहा कि चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी साबित करने के लिए याचिकाकर्ताओं की ओर से ठोस सबूत पेश नहीं की गई। केवल संदेह के आधार पर चयन प्रक्रिया को मनमाना नहीं माना जा सकता। इसी तरह पक्षपात और भाई-भतीजावाद के आरोप भी पर्याप्त साक्ष्य के बिना स्वीकार नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चयन समिति के मूल्यांकन में अदालत अपीलीय प्राधिकारी की तरह दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती।
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30 साल बाद नियुक्तियां खोलना उचित नहीं
कोर्ट ने माना कि चयनित कर्मचारियों में कई सेवानिवृत्त हो चुके हैं, कुछ की मृत्यु हो चुकी है और कुछ इस्तीफा दे चुके हैं। वहीं कई कर्मचारी पदोन्नति के बाद अभी सेवा में हैं। ऐसे में करीब तीन दशक बाद नियुक्तियों को चुनौती देने से स्थापित स्थिति प्रभावित होगी। निजी प्रतिवादियों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा, जिनके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
16 साल तक सूचीबद्ध नहीं हुई याचिका
हाई कोर्ट ने मामले के करीब 16 वर्षों तक सूचीबद्ध नहीं होने पर भी गंभीर चिंता जताई। 13 जुलाई 2000 को मामले को एक वर्ष के भीतर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन यह 25 अप्रैल 2016 को ही सूचीबद्ध हो सका।
कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि समयबद्ध सुनवाई और सूचीबद्धता संबंधी न्यायिक आदेशों के पालन की निगरानी में किसी प्रणालीगत या प्रक्रियागत कमी की जांच की जाए और जरूरत होने पर प्रभावी संस्थागत व्यवस्था को मजबूत किया जाए।
