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    पंजाब हरियाणा HC का बड़ा फैसला, भर्ती में गड़बड़ी पर हाई कोर्ट का मेरिट से समझौता न करने का आदेश

    Updated: Sun, 31 Aug 2025 04:08 PM (IST)

    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा पुलिस कांस्टेबल भर्ती-2018 की लिखित परीक्षा में उत्तर कुंजी की त्रुटियों को लेकर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि योग्य उम्मीदवारों को तकनीकी खामियों या मूल्यांकन की गलतियों के कारण वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने भर्ती संस्थाओं को उत्तर कुंजी सटीक रखने के निर्देश दिए ताकि उम्मीदवारों का विश्वास बना रहे।

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    पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट (फाइल फोटो)

    राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा पुलिस कांस्टेबल भर्ती-2018 की लिखित परीक्षा से जुड़े विवाद में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि भर्ती परीक्षाओं में उत्तर कुंजी की स्पष्ट त्रुटियों के कारण योग्य उम्मीदवारों को वंचित नहीं किया जा सकता।

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    कोर्ट ने कहा कि तकनीकी खामियों या मूल्यांकन की गलतियों से अभ्यर्थियों की मेहनत और मेरिट का नुकसान होना न्यायसंगत नहीं है। यह मामला मंगल सिंह व अन्य बनाम हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के तहत सामने आया था।

    याचिकाकर्ताओं के वकील रजत मोर ने कोर्ट को बताया कि याची ने वर्ष 2018 में जारी विज्ञापन के तहत कांस्टेबल पदों के लिए आवेदन किया था। चयन प्रक्रिया कई चरणों में आयोजित हुई थी, जिसमें लिखित परीक्षा, फिजिकल स्क्रीनिंग टेस्ट, फिजिकल मेजरमेंट टेस्ट और दस्तावेज़ जांच शामिल थे। याचिकाकर्ता पीएसटी और पीएमटी सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर गए थे, लेकिन 28 फरवरी 2019 को घोषित फाइनल मेरिट सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति आयोग द्वारा जारी उत्तर कुंजी से थी, जो 18 जनवरी 2019 को प्रकाशित की गई थी। 

    प्रश्न संख्या 28 और 94 को लेकर उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। प्रश्न संख्या 94 पर विवाद यह प्रश्न अंग्रेज़ी व्याकरण से संबंधित था। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि अलग-अलग प्रश्नपत्र सेट में एक ही प्रश्न के लिए भिन्न-भिन्न सही उत्तर बताए गए, जिससे भ्रम और अन्याय हुआ। हालांकि कोर्ट ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत का कहना था कि 25 अलग-अलग सेटों में से दो सेटों में दिखाई देने वाली असंगति मात्र से त्रुटि साबित नहीं होती।

    इसके अलावा, अंग्रेज़ी व्याकरण जैसे विषयों में अदालत विशेषज्ञ की भूमिका नहीं निभा सकती। कर्मचारी चयन आयोग ने कोर्ट को बताया कि सभी आपत्तियों को मुख्य परीक्षक और विशेषज्ञ समिति के पास भेजा गया था। आयोग स्वयं विशेषज्ञ संस्था नहीं है, इसलिए उसे विशेषज्ञों की राय पर भरोसा करना पड़ा। राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि अदालतों को सामान्य परिस्थितियों में उत्तर कुंजी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए l

    जस्टिस जगमोहन बंसल ने आदेश सुनाते हुए कहा कि शैक्षणिक मूल्यांकन और परीक्षाओं में न्यायालय की दखल सीमित होनी चाहिए। लेकिन जब त्रुटि प्रत्यक्ष, स्पष्ट और निर्विवाद हो, तो अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती। उन्होंने कहा कि भर्ती संस्थाओं की ज़िम्मेदारी है कि सभी सेटों में उत्तर कुंजी एक समान और सटीक हो, ताकि उम्मीदवारों का विश्वास बना रहे।