2015 का केस छिपा पंजाब में 2019 में पाई सरकारी नौकरी, सजा के बाद भी दी ड्यूटी; सच सामने आया तो हुआ डिसमिस
करमजीत सिंह ने 2019 में सरकारी नौकरी लेते समय 2015 का आपराधिक मामला छिपाया। सजा के बाद भी सेवा में ...और पढ़ें

ये AI जनरेटेड प्रतीकात्मक तस्वीर है।
HighLights
क्लर्क ने 2015 का आपराधिक मामला छिपाकर नौकरी पाई।
सजा होने के बाद भी सरकारी सेवा में बना रहा कर्मचारी।
पंजाब सरकार ने कानूनी राय पर कर्मचारी को बर्खास्त किया।
रोहित कुमार, चंडीगढ़। सरकारी नौकरी पाने के लिए दिए गए एक घोषणा पत्र में छिपाया गया आपराधिक मामले का सच आखिरकार सरकारी नौकरी पर भारी पड़ गया। सहकारी सभाओं के ऑडिट विभाग में क्लर्क के पद पर नियुक्त करमजीत सिंह ने नौकरी लेते समय घोषित किया था कि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला अदालत में लंबित नहीं है।
बाद में विभाग को पता चला कि उसके खिलाफ वर्ष 2015 से ही आपराधिक मामला चल रहा था। इतना ही नहीं, नौकरी मिलने के बाद अदालत ने उसे इसी मामले में तीन वर्ष की सजा और 15 हजार रुपये जुर्माने से भी दंडित कर दिया। इसके बावजूद वह सरकारी सेवा में बना रहा। मामला खुलने के बाद पंजाब सरकार ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया।
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2019 में मिली नौकरी
करमजीत सिंह को वर्ष 2019 में सहकारी सभाओं के आडिट विभाग में क्लर्क नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के समय विभागीय नियमों के तहत उससे चरित्र और आपराधिक मामले से संबंधित घोषणा ली गई थी। इसमें कर्मचारी को अपने खिलाफ चल रहे किसी आपराधिक मामले अथवा पूर्व में हुई सजा की जानकारी देनी होती है।
विभागीय जांच में सामने आया कि जिस समय उसे सरकारी नौकरी मिली, उस समय उसके खिलाफ वर्ष 2015 का आपराधिक मामला पहले से चल रहा था। मामला होशियारपुर की अदालत में भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत चल रहा था। अदालत ने 21 अक्टूबर 2021 को फैसला सुनाते हुए उसे तीन वर्ष की सजा और 15 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
सजा के बाद भी विभाग को नहीं बताया
मामले का सबसे अहम पहलू यह रहा कि अदालत से सजा होने के बाद भी कर्मचारी सरकारी सेवा में बना रहा। विभाग को इस मामले की जानकारी अप्रैल 2022 में मिली, जब उसके खिलाफ शिकायत पहुंची। इसके बाद विभाग ने पूरे मामले की जांच शुरू की। जांच के दौरान करमजीत सिंह से स्पष्टीकरण मांगा गया।
उसने माना कि आपराधिक मामला उसी से संबंधित है। उसने यह भी बताया कि मामले में अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर की गई है। हालांकि विभाग के लिए बड़ा सवाल यह था कि नियुक्ति के समय आपराधिक मामले की जानकारी क्यों छिपाई गई और बाद में सजा होने के बावजूद विभाग को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई।
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ऐसे कर्मचारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता
विभागीय जांच के बाद मामला पंजाब के एडवोकेट जनरल के पास कानूनी राय के लिए भेजा गया। कानूनी राय में माना गया कि नियुक्ति के समय आपराधिक मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने के कारण कर्मचारी पर सरकारी सेवा में भरोसा करना उचित नहीं है। इसके बाद विभाग ने बर्खास्तगी की कार्रवाई की सिफारिश की।
सरकार ने जांच रिपोर्ट और कानूनी राय के आधार पर पंजाब सिविल सर्विसेज (सजा एवं अपील) नियम, 1970 के तहत करमजीत सिंह को सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया। इस मामले ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सरकारी नौकरी के आवेदन में आपराधिक मामले से संबंधित जानकारी छिपाना बाद में नियुक्ति रद्द होने या सेवा से बर्खास्तगी का आधार बन सकता है।
