चंडीगढ़, [डाॅ. सुमित सिंह श्योराण]। यह कहानी धनंजय चौहान की है, जिन्‍होंने ट्रांसजेंडर होने को शर्म और अ‍भिशाप होने की जगह फख्र बना दिया। कभी ताने, दुत्‍कार और उपेक्षा का शूल भोगने वाले आज धनंजय देश-विदेश में सम्‍मानित किए जाते हैं। धनंजय का संघर्ष और जज्‍बा एक गौरव यात्रा की कहानी है और यह समाज को आईना दिखाती है। उन्‍होंने जीवन के हर मोड़ पर संघर्ष किया और समाज से मिला अपमान सहन किया। लेकिन, हौसले इतने बुलंद थे कि हर अग्निपरीक्षा में सफल रहे और लोगों की सोच को बदल दिया। आज ट्रांसजेंडर्स से जुड़े मुद्दों पर उन्हें देश ही नहीं विदेश में होने वाले सेमिनार, कांफ्रेंस और अन्य बड़े आयोजनों में सम्मान के साथ बुलाया जाता है।

चंडीगढ़ की ट्रांसजेंडर वुमेन धनंजय चौहान आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। आज धनंजय पूरे देश में ट्रांसजेंडर्स समुदाय को समाज में उनके हक दिलाने के लिए लड़ाई लड़ रही हैं। 49 वर्षीय धनंजय ट्रांसजेंडर को समाज में बराबर का सम्मान दिलाना चाहती हैं। उनका जन्‍म 1971 में उत्तराखंड के देवप्रयाग स्थित पौड़ी गढ़वाल में जन्म हुआ। परिवार में माता-पिता के अलावा एक बड़ा भाई और बहन भी थी। बड़े भाई की हादसे में मौत हो गई और बहन शादीशुदा है।

चंडीगढ़ में धनंजय चौहान को सम्‍मानित करते नगर निगम मेयर।

धनंजय कहते हैं, उनके लिए जीवन का अभी तक का सफर बहुत दर्द भरा रहा है। सात साल की आयु में जब उनमें लड़की जैसे लक्षण दिखने लगे तो परिवार वाले एक झाड़फूक वाले बाबा के पास ले गए। उन्‍हें गर्म चिमटे लगाए गए और खुद को लड़का समझने के लिए मजबूर किया गया। वक्त के साथ सच्चाई को मनमार छिपाते रहे।

धनंजय के अनुसार, लड़की वाले लक्षण के कारण स्कूल और काॅलेज में भी दूसरों से अलग समझा जाता। कई बार परिवार को हकीकत से रूबरू करवाया लेकिन समाज की लाज से स्‍वजनों ने भी कभी साथ नहीं दिया। धनंजय ने कहते हैं, 1992 में मर्जी के बिना ही परिवार ने शादी करा दी, लेकिन मैंने पत्‍नी को  सच्चाई बता दी कि वह ट्रांसजेंडर हैं। इसके बाद मैं परिवार से अलग नहीं हुई न ही परिवार को छोड़ा। बस दूरी बन गई।

धनंजय ने बताया कि इसके बाद पत्‍नी से के साथ एक तरह से व्यक्तिगत समझौता हुआ कि हम मित्र बन कर  एक ही घर में रहेंगे लेकिन अलग-अलग। इसा तरह 1995 में शादी टूट गई और मैं अकेले ही रहने लगा। उन्होंने बताया कि बचपन से जवानी तक सामान्य जीवन के जीने के लिए डाॅक्टरों के पास बहुत धक्के खाने पड़े। बहुत शारीरिक पीड़ा सहनी पड़ी। काॅलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर रैगिंग और शारीरिक शोषण तक सहना पड़ा। इस कारण दो बार पढ़ाई भी बीच में छोड़नी पड़ी।

पंजाब यूनिवर्सिटी में नौकरी,पेपर लीक मामले  मामले में जेल भी जाना पड़ा

धनंजय चौहान ने बताया कि 1998 में उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी में क्लर्क की नौकरी ज्वाइन कर ली। लेकिन इसी बीच पेपर लीक मामले में उन्हें फंसा दिया गया। करीब नौ महीने जेल में रहने के बाद समाज ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। नौकरी भी चली गई और जिंदगी में मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा। इस दौरान परिवार और समाज किसी से भी साथ नहीं मिला।

डिप्टी अंबेसडर ब्रिटेन की ओर से आयोजित रात्रि भोज में धनंजय चौहान।

2009 में आया बड़ा बदलाव, ट्रांसजेंडर्स के हकों की लड़ाई शुरू

धनंजय ने बताया कि वह ट्रांसजेंडर्स को समाज में सम्मान नहीं दिए जाने से काफी आहत थे, लेकिन हार नहीं मानी। 2009 में गाजियाबाद से आए एक ट्रांसजेंडर दोस्त के साथ मिलकर एनजीओ 'सक्षम ट्रस्ट' बनाया और ट्रांसजेंडर्स के अधिकारों की लड़ाई शुरू की। शुरूआत में बहुत दिक्कतें आईं, लेकिन सोच लिया था कि पीछे नहीं हटना है। धीरे-धीरे हमारे हकों को लेकर समर्थन मिलने लगा। उन्होंने बताया कि बहुत से सभ्य घरों के युवक-युवतियां खुद को ट्रांसजेंडर्स बताने से बचते थे, लेकिन हमारी मुहिम के बाद चंडीगढ़ और आसपास ही करीब 2500 ट्रांसजेंडर्स ने अपनी असल पहचान को सामने रखा। 

हिमाचल स्थित सूलोनी यूनिवर्सिटी के कुलपति धनंजय चौहान को सम्मानित करते हुए।

समाज ट्रांसजेंडर्स को स्वीकार करे, आखरी सांस तक मेरा संघर्ष जारी रहेगा

धनंजय कहते हैं, आज भी ट्रांसजेंडर शब्द सुनते ही समाज का बड़ा या छोटा व्‍यक्ति चौंक जाता है और ऐसे लोगों से बचना चाहता है। समाज में ट्रांसजेंडर को कभी भी वे सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार हैं। लेकिन, हर दौर में बदलाव आता है और समाज को कुछ चीजों को वक्त के साथ अपनाना पड़ता है। 

बदलाव के लिए लड़ी लड़ाई

ट्रांसजेंडर्स राइट्स के लिए धनंजय 2009 से संघर्षशील हैं। इसके साथ ही उन्‍होंने बीच में छूट चुकी पढाई फिर शुरू की और 2016 में ट्रांसजेंडर कैटेगरी के तहत पंजाब यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। कैंपस में ट्रांसजेंडर्स के लिए अलग टाॅयलेट, फीस माफी करवाने जैसे काम करवाए। चंडीगढ़ में पहला ट्रांसजेंडर वेलफेयर बोर्ड बनवाया। एनजीओ 'सक्षम' के तहत चंडीगढ़ में करीब 2500 ट्रांसजेंडर्स को एकजुट कर उनके हक दिलाने में चौहान का विशेष योगदान है।

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काउंसलर जनरल ऑफ कनाडा की ओर से आयोजित कार्यक्रम में अपने विचार रखतीं धनंजय चौहान।

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो का ऑफर ठुकराया

पंजाब यूनिवर्सिटी से दो मास्टर डिग्री करने के बाद धनंजय चौहान ट्रांसजेंडर पर शोध (पीएचडी) कर रही हैं। उनके संघर्ष को देखकर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने उन्हें अपने देश शिफ्ट होकर पीएचडी करने का ऑफर दिया।  लेकिन, उन्‍होंने भाारत में ही ट्रासजेंडर के हक की लड़ाई लड़ने का फैसला किया। 2018 में भारत दौरे पर आए ट्रूडो ने दिल्‍ली में धनंजय को विशेष तौर पर डिनर के लिए आमंत्रित किया। अब तक फ्रांस, जर्मनी, इटली, थाइलैंड, ग्रीस सहित कई देशों में धनंजय को विभिन्न कार्यक्रमों में आमंत्रित किया गया है। देश भर में ट्रांसजेंडर्स वेलफेयर से जुड़ी बहुत से एनजीओ और कमेटी में भी इन्हें शामिल किया गया है।   

उनके संघर्ष पर बनी फिल्म

धनंजय चौहान की संघर्ष पर हाल ही में एक फिल्म भी बनी हैं। ट्रांसजेंडर्स द्वारा शिक्षा के लिए किए कड़े संघर्ष को 'एडमिटेड' फिल्म में दिखाया गया है। फिल्मकार ओजस्वी शर्मा के निर्देशन में तैयार फिल्म 13 जून को यू ट्यूब पर रिलीज की गई है। चौहान ने बताया कि फिल्म को बहुत ही अच्छा रिस्पांस मिला है। यह फिल्म सत्य घटना पर आधारित है। 

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Posted By: Sunil Kumar Jha

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