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    Chandigarh News: देश में 14 फीसद जोड़े नहीं पैदा कर सकते संतान, तीसरे पक्ष के कारण शोषण की आशंका बढ़ी

    By DeepikaEdited By:
    Updated: Mon, 08 Aug 2022 10:38 AM (IST)

    सरोगेसी रेगुलेशन एक्ट-2021 का मुख्य उद्देश्य क्लीनिक विनियमन और उनका सुपरविजन करने के साथ एआरटी को एक कानूनी ढांचा प्रदान करना और इसके दुरुपयोग को रोकना है। इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी के ग्रेटर चंडीगढ़ चैप्टर ने एक दिवसीय 17वें एआरटी अपडेट का आयोजन किया।

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    ग्रेटर चंडीगढ़ चैप्टर ने एक दिवसीय 17वें एआरटी अपडेट का आयोजन किया। (सांकेतिक)

    जागरण संवाददाता, चंडीगढ़। देश में 10 से 14 फीसदी जोड़े बांझपन से पीड़ित हैं। आज आईवीएफ इंडस्ट्रियल दर्जे तक पहुंच गया है। भारत का असिस्टेड रिप्रोडक्शन टेक्नालजी (एआरटी) बाजार तीसरे स्थान पर है, जो 28 प्रतिशत की दर से सालाना बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में तीसरे पक्ष के शामिल होने से इसके दुरुपयोग और शोषण की संभावनाएं पैदा होती हैं। इस क्षेत्र में कई नैतिक और कानूनी मुद्दे सामने आते हैं।

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    सरोगेसी रेगुलेशन एक्ट-2021 का मुख्य उद्देश्य एआरटी क्लीनिक विनियमन और उनका सुपरविजन करने के साथ एआरटी को एक कानूनी ढांचा प्रदान करना है। इसके साथ ही इसका दुरुपयोग रोकना है। इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी के ग्रेटर चंडीगढ़ चैप्टर ने एक दिवसीय 17वें एआरटी अपडेट का आयोजन किया। इसमें क्षेत्र के प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।

    इस दौरान असिस्टेड रिप्रोडक्शन टेक्नोलाजी और सरोगेसी रेगुलेशन एक्ट-2021 के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई। जन जागरूकता के लिए इस महत्वपूर्ण विषय पर पैनल डिस्कशन भी आयोजित की गई, जिसमें डा उमेश जिंदल, डा गुलप्रीत बेदी, विनीत नागपाल, डा केडी नायर, डा कुलदीप जैन, डा एलके धालीवाल, डा यशबाला, गौरव अग्रवाल (एडवोकेट) आदि शामिल थे।

    इंडियन फर्टिलिटी सोसाइटी के अध्यक्ष डा केडी नायर ने अधिनियम में मुख्य क्षेत्रों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कानून का उद्देश्य आईवीएफ केंद्रों को एक कानूनी ढांचा प्रदान करना है। इसके तहत वे असिस्टेड रिप्रोडक्शन तकनीकों का अभ्यास और सेवाएं प्रदान कर सकते हैं, जिनमें डोनर एग्स और सरोगेसी आदि शामिल हैं।

    कानून मूल रूप से डोनर और सरोगेट को सुरक्षा प्रदान करता है और सुनिश्चित करता है कि इन प्रक्रियाओं से उत्पन्न होने वाली किसी भी जटिलता के लिए वे कमीशनिंग दंपत्ति (बांझ दंपति जो इस प्रक्रिया को करवा रहें हैं ) से मुआवजे के लिए हकदार हैं। सरोगेट और डोनर्स के पक्ष में वे आईआरडीए द्वारा मान्यता प्राप्त बीमा पालिसियों को खरीद कर इसे सुनिश्चित कर सकते हैं।

    उन्होंने आगे कहा कि दूसरा मुख्य उद्देश्य युग्मकों (शुक्राणु और अंडे) के दुरुपयोग को रोकना है। यह कानून वैज्ञानिक और नैतिक कार्यों के लिए काम करने के लिए एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है, लेकिन नियमों का पालन नहीं करने वालों के लिए सख्त दंड का भी अधिनियम में प्रावधान है।

    डा गुलप्रीत बेदी निदेशक बेदी नर्सिंग होम ने मरीजों के दृष्टिकोण को नजर में रखते हुए कई मुद्दों पर प्रकाश डाला। इनमें “पूरी व्यवस्था ठीक होने तक इलाज में हो रही देरी, वीर्य और अंडा डोनर के चयन पर कई प्रतिबंधों के कारण, डोनर के लिए बीमा कवर और इससे संबंधित हलफनामे और कानूनी सलाह व इन से बढ़ने वाले इलाज के खर्चे पर होने वाली बढ़ोतरी आदि पर विचार रखे। 

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