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    यहां शुरू हुआ दस दिन का लंगूर मेला, जाने क्या है इसके पीछे की मान्यता

    By Kamlesh BhattEdited By:
    Updated: Sun, 29 Sep 2019 05:24 PM (IST)

    भूत पिशाच निकट नहीं आवे महावीर जब नाम सुहावे...। मुसीबत आने पर बजरंग बली कष्ट हर लेते हैं। इसी आस्था का प्रतीक अमृतसर के बड़ा हनुमान मंदिर में शुरू हो गया है।

    यहां शुरू हुआ दस दिन का लंगूर मेला, जाने क्या है इसके पीछे की मान्यता

    जेएनएन, अमृतसर। भूत, पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुहावे...। मुसीबत आने पर बजरंग बली कष्ट हर लेते हैं। इसी आस्था का प्रतीक अमृतसर के 'बड़ा हनुमान मंदिर' में शुरू हो गया है। दस दिनों तक चलने वाले इस मेले में बड़ी संख्या में बच्चे लंगूर बनते हैं। मेले में देशभर के हनुमान भक्तों के अलावा विदेशों में रह रहे भक्त बच्चों को लंगूर बनाने के लिए दुर्ग्याणा तीर्थ पहुंचे हैं। 

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    पुत्र रत्न प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर बनते हैं लंगूर

    हर साल लगने वाले लंगूरों के मेले के रूप में देखने को मिलता है। पुत्र रत्न प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर महिलाएं बच्चे को यहां लाकर लंगूर बनाती हैं। सैकड़ों छोटे-छोटे लड़के विशेष प्रकार का लाल रंग का जरी वाला चोला पहनते हैं। हाथ में छड़ी लिए हुए मंदिर के अंदर-बाहर मैदान में अपने सगे-संबंधियों के साथ नाचते हुए एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करते हैं। आजकल लंगूरों के मेले के लिए इस मंदिर को खूब सजाया गया है। हनुमान जी का विशेष शृंगार किया गया है। बाहर से आने वाले लंगूरों के रहने और खान-पान की व्यवस्था की गई है।

    करना होता है कई नियमों का पालन

    मंदिर में पहले दिन की पूजा में मिठाई, नारियल, दो पुष्प हार अर्पित करने होते हैं। इसके बाद पुजारी से आशीर्वाद लेकर वर्दी धारण की जाती है। फिर ढोल की थाप पर नाचा जाता है। प्रतिदिन दो समय माथा टेकना होता है। इसके अलावा जमीन पर सोना, जूते-चप्पल नहीं पहनना, चाकू की कटी हुई कोई चीज नहीं खाना आदि जैसे भी नियम हैं। खानपान वैष्णो होता है। वहीं, लंगूर अपने घर के अलावा किसी और के घर के अंदर नहीं जा सकता है।

    लंगूर बनने वाला बच्चा सुई, धागे का काम और कैंची नहीं चला सकता। उसे 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। 10 दिन तक वह ठाकुर जी का सिमरन करता है। फिर, विजयदशमी को लंगूर बना बच्चा रावण व मेघनाद के पुतलों को तीर मारता है। अगले दिन छोटे हनुमान मंदिर में हनुमान जी के आगे नतमस्तक होकर अपनी लाल रंग की वर्दी उतार देता है।

    साढ़े साती और ढैया के भी कष्ट दूर करते हैं बजरंग बली

    अगर किसी व्यक्ति पर शनि की साढ़े साती या ढैया आती है तो भी हनुमान की पूजा करने से कष्ट टूर हो जाते हैं। इसके पीछे की मान्यता इस प्रकार है। सभी देवी-देवताओं में बलशाली वीर हनुमान जी जब छोटे थे तो उन्होंने सूर्य को अपने मुंह में डाल लिया था। तब सारे संसार में अंधकार छा गया था। सभी देवताओं ने अंजनी माता से प्रार्थना की कि आप हनुमान जी को समझाएं तो हनुमान जी ने माता के कहने पर सूर्य देवता को मुक्त कर दिया था। इसी कारण सूर्य देव के पुत्र शनि जी हनुमान जी की बहुत इज्जत करते हैं।

    मंदिर का इतिहास

    श्री दुर्ग्याणा तीर्थ में स्थित श्री बड़ा हनुमान मंदिर है। वास्तव में यह मंदिर श्री दुर्ग्याणा मंदिर परिसर में अपनी अलग पहचान रखता है। परिक्रमा पथ से एक द्वार के अतिरिक्त श्री दुर्ग्याणा परिसर के बाहर से इसका मुख्य द्वार है। यह मंदिर रामायण कालीन युग से है। मंदिर में श्री हनुमान जी की बैठी अवस्था में मूर्ति है। कहा जाता है कि यह मूर्ति स्वयं भू है। इसी स्थल पर लवकुश ने वट वृक्ष से बांधा था हनुमान जी को कहा जाता है कि जब लव व कुश ने श्री राम के अश्व मेघ यज्ञ के घोड़े को रोक कर श्री राम की सत्ता को चुनौती दी थी तो उनका सामना हनुमान हनुमान जी से हुआ था।

    यह भी कहा जाता है कि लव-कुश ने इसी स्थान पर हनुमान जी को वट वृक्ष से बांध दिया था। यह वट वृक्ष आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है। श्री राम ने हनुमान जी को कराया था बंधन मुक्त पहने ही पुत्रों से युद्ध के पश्चात श्री राम जी ने स्वयं आकर हनुमान जी को बंधनमुक्त किया और आशीर्वाद दिया कि जिस तरह इस जगह उनका अपनी संतानों से मिलन हुआ है। उसी तरह यहां आकर जो प्राणी श्री हनुमान जी से संतान प्राप्ति की मन्नत करेगा। उसे संतान अवश्य ही प्राप्त होगी।

    लंगूर बनने की प्रथा श्री दुर्ग्याणा मंदिर में अश्विन मास के नवरात्रों में संतान प्राप्ति की कामना करने वाले दंपती श्री बड़ा हनुमान मंदिर में मन्नत मांग कर जाते हैं कि जब हमारे घर संतान की प्राप्ति होगी तब हम लाल चोला पहनाकर लंगूर बनाकर मंदिर में माथा टिकाने आएंगे। जिसकी भी संतान रत्न की मन्नत पूरी होती है वह उसे लंगूर बनाकर नाचते गाते हनुमान जी के दरबार में पहुंचते। यह मनोहारी दृश्य देखने लायक होता है। 

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