नितिन धीमान, अमृतसर : परी 22 दिन की हो गई। इस बच्ची को अज्ञात शख्स अस्पताल में छोड़ गया। हालत बेहद गंभीर थी। डाक्टर आशंकित थे कि बच्ची बचेगी नहीं, पर उन्होंने परी की सांसों की डोर टूटने नहीं दी। डाक्टरों का इस बच्ची से कोई नाता नहीं, पर उसकी तीमारदारी उन्होंने एक मां की तरह की। यूं कहिए कि पूरा चिकित्सा ज्ञान इस बच्ची को बचाने में लगा दिया।

दरअसल, 22 नवंबर को यह बच्ची पीडिएट्रिक वार्ड में डाक्टरों को मिली थी। इसके अभिभावकों के बारे में आसपास पूछा, पर किसी को जानकारी नहीं थी। बाद में ओपीडी स्लिप मंगवाई गई, जिसमें सुजानपुर पठानकोट दर्ज था। बच्ची के साथ कोई नहीं था। डाक्टरों ने फौरन उसका उपचार शुरू किया। बच्ची की धड़कनें व सांसें असामान्य थीं। उसे सीपैप मशीन में रखा गया। पुलिस को भी सूचना दी, पर तर्क मिला कि ओपीडी स्लिप में बच्ची के पिता—माता का नाम व पता दर्ज नहीं है। ऐसे में पुलिस इन्हें कहां तलाशेगी। डाक्टरों ने हिम्मत नहीं हारी। पीडिएट्रिक विभाग की प्रोफेसर डा. मनमीत सोढी, डा. अश्विनी सरीन, डा. नरिदर सिंह, डा. जसपाल सिंह, डा. संदीप अग्रवाल व उनकी टीम का सारा ध्यान बच्ची पर केंद्रित रहा। बिन मां की बच्ची को संभाल पाना कितना मुश्किल होता है, यह अनुमान लगाया जा सकता है। बच्ची रोती तो नर्सिंग स्टाफ सीने से लगा लेता। उसे बोतलबंद दूध पिलाया जाता। प्रशिक्षण लेने आईं मेडिकल छात्राएं भी परी को अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देती थीं। यह बच्ची सबकी प्यारी बन गई और डाक्टरों ने इसका नाम परी रखा।

13 दिसंबर को परी बिल्कुल स्वस्थ हो गई। उसकी किलकारियां अस्पताल में गूंजीं। होठों पर मुस्कान तैरनी लगी। यकीन मानिए जो बच्ची मृत्युशैया के करीब थी अब उसका चेहरा देखकर यह अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता कि वह अति गंभीर थी। गुरुनानक देव अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डा. केडी सिंह ने थाना मजीठा रोड पुलिस को पत्र लिखकर परी को प्रशासन के हवाले करने की बात कही। मंगलवार को प्रशासन द्वारा चाइल्ड लाइन संस्था की टीम भेजी गई। इसके बाद डाक्टरों व स्टाफ ने नम आंखों से परी को विदा किया। चाइल्ड लाइन संस्था फिलहाल बच्ची को अपने संरक्षण में रखेगी। जल्द ही चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की बैठक के बाद बच्ची को शिशु गृह भेजने पर विचार किया जा सकता है।

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