ओमप्रकाश तिवारी, मुंबई। उत्तर-पूर्व मुंबई से भाजपा सांसद मनोज कोटक ओवर-द-टाप (ओटीटी) प्लेटफार्म पर नियंत्रण व नियमन के लिए संसद में प्राइवेट मेंबर बिल लाने की तैयारी कर रहे हैं। जबकि प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल का मानना है कि इन माध्यमों का नियमन तो किया जा सकता है, लेकिन नियंत्रण नहीं किया जा सकता। वेब सीरीज तांडव के चौतरफा विरोध के बाद सांसद मनोज कोटक ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर को पत्र लिखकर मांग की है कि ओटीटी प्लेटफार्म इन दिनों युवावर्ग में काफी लोकप्रिय हो रहा है। लेकिन यह माध्यम किसी भी तरह के सेंसर से मुक्त है। जिसका इस प्लेटफार्म के लिए सामग्री तैयार करनेवाले लोग गलत फायदा उठा रहे हैं।

इन प्लेटफार्म पर ऐसी चीजें परोसी जा रही हैं, जो युवाओं के साथ-साथ देश के लिए भी हानिकारक साबित हो रही हैं। इन पर हिंसा, ड्रग्स का उपयोग, गाली-गलौज आदि दर्शाया जा रहा है। कभी-कभी तो ये लोग धार्मिक भावनाएं भड़काने से भी बाज नहीं आते। जिससे लोगों में गुस्सा फैलता है। 

इसका आभास हाल ही में रिलीज हुई वेब सीरीज ‘तांडव’ के बाद भी हो रहा है। इसलिए सरकार को ओटीटी प्लेटफार्म के लिए एक नियामक संस्था का गठन करना चाहिए। दैनिक जागरण से बात करते हुए मनोज कोटक कहते हैं कि वह इस विषय पर लोकसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल भी लाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि सरकार स्वयं भी इस विषय की गंभीरता को समझते हुए अब तक सेंसर से छूट पाए माध्यमों के लिए कोई नियामक संस्था बनाने की पहल करे। उत्तर प्रदेश में मिर्जापुर की सांसद अनुप्रिया पटेल ने भी कुछ माह पहले ओटीटी प्लेटफार्म पर ही रिलीज की कई वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि इस सीरीज में दिखाई गई हिंसा, गाली-गलौज से उनके संसदीय क्षेत्र का नाम खराब हो रहा है।

बता दें कि बड़े पर्दे पर दिखाई जानेवाली फिल्मों के लिए 1952 में सिनेमैटोग्राफ एक्ट का गठन किया गया था। इसी एक्ट फिल्मों को सेंसर प्रमाणपत्र प्रदान किया जाता है। इसके बावजूद फिल्मों को लेकर अक्सर विवाद उठते रहते हैं। इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक जनवरी, 2016 को प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। इस कमेटी को फिल्म प्रमाणन के क्षेत्र में लागू सबसे बेहतर नियमों का अध्ययन कर ऐसे नियम नियम तैयार करने को कहा गया था, जिनमें लोगों की भावनाएं आहत किए बिना कलात्मक स्वतंत्रता को बरकरार रखा जा सके। 

सिर्फ फिल्मों के संदर्भ बनी इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट उसी वर्ष 29 अप्रैल को सरकार को सौंप दी थी। क्या ऐसा ही कोई नियमन ओटीटी प्लेटफार्म के लिए भी होना चाहिए ? इस सवाल का जवाब देते हुए श्याम बेनेगल कहते हैं कि ऐसे माध्यमों का नियमन तो किया जा सकता है। क्योंकि हमारा सामाजिक जीवन भी कुछ नियम-कायदों के अनुरूप ही चलता है। संविधान को भी नियमन का अधिकार है। लेकिन इन पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। नियंत्रण लोकतंत्र का हिस्सा नहीं है।

सेंसरशिप के मुद्दे पर अपनी बात खुलकर रखनेवाले अधिवक्ता हितेश जैन का मानना है कि सबके लिए नियम बराबर होने चाहिए। थिएटर में प्रदर्शित होने जा रही फिल्मों पर एक कानून लागू होता है, ओटीटी के लिए दूसरा कानून। यह भेदभाव नहीं होना चाहिए। एक ही सिनेमा के लिए दो अलग तरह की कानून प्रक्रिया क्यों होनी चाहिए ? माध्यम भले बदल जाए, लेकिन सिनेमा तो सिनेमा ही रहता है। उसके लिए नियम समान होने चाहिए।

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