शिल्प कुमार। योग को लेकर हम इन दिनों बेहद सजग हैं। लेकिन योग का हमारा प्राचीन ज्ञान हमारे लिए वैश्विक प्रगति की राह भी खोल सकता है। जब दुनिया की अन्य सभ्यताओं ने ठीक से आंखें तक नहीं खोली थी, भारतीय मनीषा ने ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में जबर्दस्त कामयाबी हासिल की थी। इसी कामयाबी का एक सिरा शारीरिक और मानसिक के साथ आध्यात्मिक तंदुरुस्ती बढ़ाने के विज्ञान से जुड़ा था। आज जिस योग को हम फिर से प्रतिष्ठित होते हुए देख रहे हैं वह तो उस ज्ञान का एक छोटा सा हिस्सा है। महर्षि पतंजलि ने चित्त की वृत्तियों के निरोध के लिए अपने मशहूर ग्रंथ योग सूत्र में जिस योग की परिकल्पना की, वह आज योग के रूप में प्रचलित ज्ञान का महज चौथाई हिस्सा भर है। महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में अष्टांग योग की व्यवस्था दी है, जो इस प्रकार हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। ये सभी एक-दूसरे से जुड़ने वाली कड़ियां हैं, जिसका चरम समाधि होता है।

दुनियाभर में योग का व्यापक प्रसार

बहरहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनियाभर में योग का व्यापक प्रसार किया है। ऐसा नहीं है कि दुनिया में पहले योग का अस्तित्व नहीं था लेकिन वैश्विक स्तर पर उसे आधिकारिक मान्यता 21 जून 2014 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व योग दिवस घोषित किए जाने के बाद मिली है। आज के योग में बेशक केवल आसन और प्राणायाम ही शामिल हो लेकिन मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में योग के ये दोनों अंग ही शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और मानसिक शांति दिलाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। चूंकि दुनियाभर में लोगों को योग लुभा रहा है, और लोगों को इसके फायदे भी मिल रहे हैं, इसलिए इसकी ट्रेनिंग वालों की मांग भी बढ़ी है। लेकिन योग, आसन या प्राणायाम की सही जानकारी दे पाने वाले लोगों की भारी कमी है। योग की उद्गम भूमि भारत है, इसलिए दुनिया के दूसरे देशों के लोगों में भारतीय योग ट्रेनरों को लेकर ज्यादा भरोसा है।

योग संस्‍थान

वैसे तो दिल्ली में मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान और बिहार के मुंगेर में बिहार योग विद्यालय है। दुनियाभर में योग के पठन-पाठन, शिक्षण और प्रशिक्षण के लिए इसकी प्रतिष्ठा है। मुंगेर में गंगा नदी के किनारे स्थित इस विद्यालय को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा तक हासिल है। गंगा दर्शन के लिए मशहूर इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1964 में स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपने गुरु स्वामी शिवानंद के मंतव्य के मुताबिक योग की प्राच्य विद्या शिक्षा देने के लिए की थी। बेशक इसे दुनिया का प्रथम योग विश्वविद्यालय होने का गौरव हासिल है जिसके 200 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय एवं सैकड़ों राष्ट्रीय योग व आध्यात्मिक केंद्र हैं। योग दर्शन, योग, मनोविज्ञान, अप्लायड योग और पर्यावरण योग की कक्षाएं चलाने वाले इस विश्वविद्यालय की शैक्षिक पद्धति गुरुकुल जैसी है, जहां चातुर्मासिक योग सर्टिफिकेट का पाठ्यक्रम चलता है।

योग का प्रशिक्षण

इसी तरह दिल्ली के मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान में भी लोग योग का प्रशिक्षण और अभ्यास करते हैं। इसके बावजूद इस क्षेत्र में बहुत संभावनाएं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई मौकों पर कह चुके हैं कि उनका सपना भारत की प्रतिष्ठा विश्व गुरु के तौर पर दिलाना है। आर्थिक तौर पर महाशक्ति बनने की राह पर तेजी से अग्रसर अपने देश के लिए स्वस्थ नागरिक भी उतने ही जरूरी हैं। ताकि आर्थिक प्रगति में वे भागीदार हो सकें। 1भारत को विश्व गुरु का स्थान प्राप्त था क्योंकि श्रेष्ठतम शिक्षक और विश्वविद्यालय (नालंदा और तक्षशिला) भारत में थे, जिनमें प्रवेश पाना व अध्ययन करना पूरे विश्व में गौरव का विषय समझा जाता था। इसी कारण दुनियाभर के विद्यार्थी विभिन्न विषयों में ज्ञान प्राप्त करने के लिए हजारों किलोमीटर दूर से कठिन यात्र कर भारत आते थे।

विश्व गुरु के रूप में स्थापित

भारत को दुनिया में विश्व गुरु के रूप में स्थापित करने के लिए देश में कुछ और योग संस्थान के साथ-साथ यहां एक अंतरराष्ट्रीय योग विश्वविद्यालय भी स्थापित किए जाने पर विचार किया जाना चाहिए, एक ऐसा आवासीय विश्वविद्यालय जिसमें भारत के साथ-साथ संपूर्ण विश्व से विद्यार्थी योग में विभिन्न अवधि के कोर्स व शोध कार्य करने के लिए प्रतिस्पर्धा करें। ऐसा विश्वविद्यालय जहां दुनिया के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक हों, जहां योग से संबंधित सभी ग्रंथ, शास्त्र, वेद, पुराण उपलब्ध हों। ऐसा विश्वविद्यालय जहां से ज्ञान व प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद योग का ज्ञान व प्रशिक्षण विभिन्न देशों में दे सकें। दुनिया में योग के बारे में लोगों में रुचि बढ़ रही है, लेकिन जरूरत के अनुरूप  प्रशिक्षित लोगों की कमी है। ऐसा करने से बहुत से बेरोजगार युवाओं को देश-विदेश में न केवल रोजगार मिलेगा, बल्कि संपूर्ण विश्व में भारत विश्व गुरु के रूप में स्थापित होने की दिशा में पहला बड़ा कदम साबित हो सकता है।

संस्थानों के लिए मुफीद जगह

इन योग विश्वविद्यालयों और संस्थानों के लिए सबसे बेहतर हिमालयी राज्य हो सकते हैं। हिमालय की गोद में बसे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, और उत्तर पूर्व के राज्यों का मनोरम और प्राकृतिक वातावरण इन संस्थानों के लिए मुफीद जगह हो सकते हैं। इन राज्यों में योग संस्थानों या विश्वविद्यालयों को खोले जाने से दोहरे लाभ होंगे। एक तरफ जहां बाहरी इलाकों से आकर लोग यहां योग की शिक्षा हासिल करेंगे, वहीं स्थानीय स्तर पर भी रोजगारी और कारोबारी माहौल विकसित होगा। इन विश्वविद्यालयों में योग के साथ ही आयुर्वेदिक उपचार से भी जुड़े पाठ्यक्रम चलाए जा सकते हैं।

भागदौड़ भरी जिंदगी में सुकून की तलाश

भागदौड़ भरी जिंदगी में आज के इंसान को न सिर्फ सुकून की तलाश है, बल्कि वह उचित खान-पान और उचित रहन-सहन के लिए डायटिशियन और आयुष विशेषज्ञों के साथ ही योग के जानकारों की सेवा लेना चाहता है। हिमालयी राज्यों में स्थापित योग के विश्वविद्यालय और विद्यापीठ आम लोगों की इस कमी को पूरा करके न केवल राष्ट्र की स्वास्थ्य रक्षा में बड़ा योगदान दे सकते हैं, बल्कि बेरोजगारी के संकट के निबटारे में किंचित सहयोग दे सकते हैं। 1हिमालयी राज्यों में खोले जाने वाले योग संस्थान या विश्वविद्यालय भी नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भागीदार होंगे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) 

Posted By: Kamal Verma