डॉ. अश्विनी महाजन। पिछले कुछ महीनों से रुपये में भारी अवमूल्यन हो रहा था। जहां विनिमय दर अप्रैल 2018 में लगभग 64 रुपये प्रति डॉलर थी वहीं 11 अक्टूबर 2018 तक वह 74.48 रुपये प्रति डॉलर पहुंच चुकी थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों में रुपया मजबूत होता हुआ एक दिसंबर तक 69.77 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। एक ओर जहां कमजोर होते रुपये के चलते देश में चिंता का माहौल व्याप्त हो रहा था, नीति निर्माण से जुड़े हुए कई महानुभाव यह कहते सुने जा रहे थे कि रुपये का गिरना स्वाभाविक है, क्योंकि वह पहले से ही जरूरत से ज्यादा मजबूत है। उनका यह भी कहना था कि रुपये में मजबूती से देश को नुकसान हो रहा है, क्योंकि उससे हमारे निर्यात प्रभावित होते हैं। रुपये को जरूरत से ज्यादा मजबूत बताते हुए उसे कमजोर करने की वकालत करने वाले इन विशेषज्ञों में भी अलग-अलग राय थी। नीति आयोग के उपाध्यक्ष जुलाई माह में यह कह रहे थे कि रुपया पांच से सात प्रतिशत अधिक मूल्यवान है और कई विशेषज्ञ तो यह भी कह रहे थे कि यह 15 प्रतिशत ज्यादा मूल्यवान है और कुछ अन्य रिपोर्ट में इसे 10 प्रतिशत ज्यादा मूल्यवान बताया गया था।

अस्थाई कारणों से रुपया गिरा
पिछले लगभग छह महीनों में रुपये की कमजोरी के कई कारण रहे। सबसे पहला कारण यह था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें काफी तेजी से बढ़ रही थीं। गौरतलब है कि भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का लगभग 70 प्रतिशत विदेशों से आयात करता है। यदि ईरान को छोड़ दिया जाए तो शेष सभी देशों से इस कच्चे तेल के लिए डॉलर में भुगतान होता है, जबकि अक्टूबर 2017 में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत मात्र 60 डॉलर प्रति बैरल थी, वह अक्टूबर 2018 आते-आते 86 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकी थी। इसके चलते हमारा तेल बिल बढ़ता गया और इस कारण से डॉलर की मांग भी। रुपये की कमजोरी का एक दूसरा प्रमुख कारण था कि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने अपने निवेश को भारत से ले जाना शुरू किया। इस कारण भी देश में डॉलर की मांग बढ़ गई। रुपये की कमजोरी का तीसरा कारण यह बताया जाता है कि अमेरिका ने कंपनी और व्यक्तिगत आयकर में भारी कमी कर दी जिसके चलते वैश्विक निवेशक अमेरिका की ओर आकृष्ट होने लगे। दूसरी ओर अमेरिकी फेडरल रिजर्व (अमेरिका का केंद्रीय बैंक) ने ब्याज दर में वृद्धि कर दी, और यह भी वैश्विक निवेशकों के अमेरिका की ओर आकर्षित होने का कारण बना।

हमेशा नहीं बढ़ती कच्चे तेल की कीमत
देखा जाए तो जहां तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों का प्रश्न है वह हमेशा नहीं बढ़ती रहती। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि सामान्यत: ‘ओपेक’ देशों द्वारा आपूर्ति को सीमित कर देने के कारण बढ़ती है। लेकिन आखिरकार अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आपूर्ति बढ़ने से तेल की कीमतें फिर नीचे आ जाती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ने के कारण इसकी कीमत में और कमी भी आ सकती है। तेल की कीमत में एक डॉलर प्रति बैरल की गिरावट हमारे वार्षिक तेल बिल को 1.5 अरब डॉलर कम कर सकती है।

दूसरा मुख्य कारण
रुपये की कमजोरी का एक दूसरा मुख्य कारण यह था कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक भारत से विदेशी मुद्रा बाहर ले जा रहे थे। यह क्रम भी रुक गया है और उन्होंने दोबारा भारत का रुख किया है। शेयर बाजार में पिछले दिनों की वृद्धि इस बात की ओर इंगित कर रही है। इस प्रकार एक बार फिर से कच्चे तेल की घटती कीमतें और दूसरी ओर पुन: विदेशी निवेशकों का भारत की ओर आकर्षण स्वभाविक रूप से डॉलर की मांग को कम कर रहा है और रुपया स्वभाविक रूप से मजबूत होने लगा है।

भारतीय रिजर्व बैंक
निराशाजनक बात यह है कि जब रुपया अस्थाई कारणों से इसलिए कमजोर हो रहा था, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक ने अस्थाई रूप से अवमूल्यन को नियंत्रित करने हेतु जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया। इससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण यह कि नीति-निर्माण से जुड़े महानुभाव रुपये को और अधिक कमजोर करने की वकालत कर रहे थे। जबकि यह स्पष्ट था कि रुपये में यह कमजोरी भारतीय अर्थव्यवस्था में मौलिक कारणों से नहीं, बल्कि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और विदेशी निवेशकों के जाने जैसे अस्थाई कारणों से हो रही है। सर्वविदित है कि देश में जीडीपी ग्रोथ की दर बढ़ती जा रही है महंगाई दर लगातार घट रही है, विभिन्न नीतिगत सुधारों के कारण देश में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ सुधर रहा है, और कृषि एवं औद्योगिक उत्पादन में निरंतर वृद्धि हो रही है। ऐसी परिस्थितियों में नीति आयोग के उपाध्यक्ष, देश के आर्थिक मामलों के सचिव और देश के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार रुपये को और कमजोर करने की वकालत बेतुके तर्को के आधार पर कर रहे थे। रुपये में पिछले दिनों में आ रही मजबूती ने उनके तर्को को निराधार सिद्ध कर दिया।

सुधार की बनी हुई है गुंजाइश
पिछले दशकों में डब्लूटीओ के समझौतों के कारण हमारे देश के आयात लगातार बढ़ते रहे और निर्यातों में अपेक्षित वृद्धि न होने के कारण हमारा व्यापार घाटा और भुगतान शेष घाटा लगातार बढ़ता गया। इस कारण डॉलर की आपूर्ति कम बढ़ी और मांग ज्यादा। वास्तविकता यह है कि भूमंडलीकरण के प्रति नीति निर्माताओं के जरूरत से ज्यादा आग्रह के कारण डब्लूटीओ के समझौतों के अनुसार भी जितना आयात शुल्क भारत लगा सकता था, उसका एक चौथाई से लेकर आधी दर तक ही आयात शुल्क लगाए गए। इस कारण हमारे देश के उद्योग-धंधे नष्ट होने लगे और हमारी निर्भरता आयातों पर बढ़ गई। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम अपने आयातों को यथासंभव न्यूनतम करें ताकि रुपये में अनावश्यक कमजोरी को रोका जा सके। एक मोटे अनुमान के अनुसार डॉलर के मुकाबले मात्र एक रुपये की कमजोरी भी देश की आयात बिल को 12 हजार करोड़ रुपये तक बढ़ा देती है। इसलिए सरकार को आयात शुल्क बढ़ाकर रुपये को मजबूत करने हेतु कदम उठाने होंगे। विनिमय दर में अस्थाई उतार-चढ़ाव हेतु रिजर्व बैंक का दखल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)

 

Posted By: Kamal Verma

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